Shrimad Bhagavad Gita - Summary

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 3 - विद्वानों (शिक्षित) व्यक्तियों को चाहिए कि वे शास्त्रों अनुसार साधना करें (5)

गीता अध्याय 3 श्लोक 25 से 29 तक का भावार्थ:- पवित्र यजुर्वेद अध्याय 40 श्लोक 13 में वेद ज्ञान दाता ब्रह्म ने कहा है कि जिस व्यक्ति को अक्षर ज्ञान है उसे विद्वान कहते हैं जिसे अक्षर ज्ञान नहीं है उसे अविद्वान कहते हैं। परन्तु विद्वान तथा अविद्वान की वास्तविक जानकारी तत्वदर्शी सन्त ही बताते हैं उनसे सुनों। पूर्ण परमात्मा कविर्देव जी ने अपनी अमृतवाणी (कविर्वाणी) में विद्वान तथा अविद्वान की परिभाषा बताई है। कहा है कि जिसे तत्वज्ञान है वह वास्तव में विद्वान है। केवल अक्षर ज्ञान (किसी भाषा का ज्ञान) होने से विद्वान नहीं होता। क्योंकि जो संस्कृत भाषा में विद्वान माना जाता है, वह पंजाबी भाषा को न जानने वाला उस भाषा में अविद्वान है।

इसी आधार से गीता अध्याय 3 श्लोक 25 से 29 तक के ज्ञान को जानना है। श्लोक 25 में कहा है कि शास्त्राअनुकूल साधना रूपी कर्तव्य कर्म में आसक्त अविद्वान अर्थात् अशिक्षित् जिस प्रकार भक्ति कत्र्तव्य कर्म करते हैं। विद्वान (शिक्षित्) भी लोक संग्रह अर्थात् अधिक अनुयाई इकट्ठे करना चाहता हुआ उसी प्रकार करे (जैसे अविद्वान अर्थात् भोले भाले अशिक्षित शास्त्रानुकूल साधना तत्वदर्शी सन्त से प्राप्त करके करते हैं इस प्रकार पाप को प्राप्त नहीं होगा।)

अध्याय 3 श्लोक 26 का भावार्थ है कि तत्वदर्शी सन्त द्वारा शास्त्राविधि अनुसार साधना प्राप्त अशिक्षित व्यक्ति की बुद्धि में शिक्षित (अक्षर ज्ञान युक्त) व्यक्ति भ्रम उत्पन्न न करे अपितु स्वयं भी शास्त्राअनुसार साधना करे तथा उनको भी प्रोत्साहित करे। जैसे परमेश्वर कबीर बन्दी छोड़ जी तत्वदर्शी संत की भूमिका करने के लिए काशी नगर में जुलाहा जाति में प्रकट हुए। लोग उन्हें अशिक्षित अर्थात् अविद्वान मानते थे। परन्तु वे सर्व विद्वानों के विद्वान तथा सर्व भगवानों के भगवान हैं। अन्य अशिक्षित व्यक्तियों को शास्त्राविधि अनुसार साधना प्रदान करते थे। अन्य अक्षर ज्ञानयुक्त व्यक्ति (ब्राह्मण) उन मन्दबुद्धि वाले भोले-भाले व्यक्तियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न कर देते थे कहा करते यह जुलाहा तो अशिक्षित है। यह क्या जाने शास्त्रों के गूढ़ रहस्य को तुम्हारी साधना व्यर्थ है। वे भोले-भाले अशिक्षित विचलित हो जाते थे तथा मार्ग भ्रष्ट होकर जीवन व्यर्थ कर लेते थे। गीता अध्याय 3 श्लोक 26 में यही कहा है कि वह विद्वान (शिक्षित व्यक्ति) यदि जनता को शिष्य रूप में इकट्ठा करना चाहता है तो स्वयं भी शास्त्राअनुसार साधना करे तथा उन भोले-भालों से भी करावे।(3/26)

अध्याय 3 श्लोक 27 से 29 का भावार्थ है कि प्राणी जब तक पूर्ण सन्त की शरण ग्रहण नहीं करता तब तक अपने संस्कार ही प्राप्त करता है। संस्कार का फल तीनों भगवानों (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव) द्वारा दिया जाता है तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा,सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव) प्रकृति अर्थात् दुर्गा से उत्पन्न है। वह शिक्षित व्यक्ति तत्वज्ञान से अपरिचित होने से मूढ़ कहा जाता है फिर वह अहंकार वश अपने को कर्मों का कत्र्ता मानता है। अहंकार वश सर्व शास्त्रों को तत्वज्ञानी द्वारा अच्छी तरह समझ कर भी अपने अहंकार युक्त हठ को स्वभाव वश नहीं छोड़ता अर्थात् वास्तविक्ता को आँखों देखकर भी स्वीकार नहीं करता परन्तु तत्वदर्शी सन्त तत्वज्ञान के आधार से प्रत्येक प्रभु की शक्ति से परिचित होकर इन भगवानों व शास्त्रों विरूद्ध साधना पर आसक्त नहीं होता। वे शिक्षित परन्तु तत्वज्ञान से अपरिचित स्वयं तो तीनों प्रभुओं में अपने स्वभाव वश आसक्त रहते हैं उनको चाहिए कि वे उन पूर्णतया न समझने वाले मन्द बुद्धि अर्थात् भोले-भाले अशिक्षितों को पूर्णतया शास्त्रा समझ कर भी अहंकार वश सत्य न स्वीकार करने वाले विद्वान अर्थात् शिक्षित जन विचलित न करें। इसलिए उन अशिक्षितों को श्लोक 35 में सावधान किया है कि दूसरों की शास्त्राविरूध साधना जो गुण रहित है चाहे कितनी ही तड़क-भड़क वाली व देखने व सुनने में अच्छी हो उसे स्वीकार न करें। अपनी शास्त्रा अनुकूल साधना को मरते दम तक करता रहे। दूसरों की साधना भय उत्पन्न कर देती है जिस कारण मन्द बुद्धि व्यक्ति वास्तविक साधना को त्यागकर गुण रहित धर्म (धार्मिक क्रिया) को स्वीकार कर लेते हैं जो बहुत हानिकारक होती है।

गीता अध्याय 3 के श्लोक 30 में कहा है कि अर्जुन अब ज्ञान योग द्वारा मेरे पर आश्रित होकर अर्थात् सर्व धार्मिक कर्मों को मुझमें त्यागकर निःइच्छा, ममता रहित युद्ध में होने वाले संभावित दुःख को त्यागकर युद्ध कर।

विचार करें:-- गीता अध्याय 3 के श्लोक 31-32 का सार है कि जो ऊपर लिखे मेरे मत का अनुसरण करते हैं वे बुरे कर्मों से बच जाते हैं। जो ऐसा नहीं करते वे मूर्ख-अज्ञानी हैं। वे सर्व शास्त्रा विरूद्ध ज्ञानों पर आसक्त हैं जो हानिकारक है। उनका पतन निश्चय है। ऊपर लिखे मत (सलाह) से तात्पर्य यह है कि देवी-देवताओं, प्रेतों व पित्रों की पूजा न करके केवल परमात्मा की आराधना करनी चाहिए। यज्ञ व ऊँ नाम का जाप भी निष्काम भाव से अपना मानव कर्तव्य जान कर तथा पूरा गुरु बनाकर शास्त्रा अनुकूल करना चाहिए। शिक्षित व्यक्तियों को शास्त्राविधि अनुसार साधना कर रहे अशिक्षितों को भ्रमित नही करना चाहिए अपितु स्वयं भी उसी शास्त्राविधि अनुसार साधना को स्वीकार करके आत्मकल्याण कराना चाहिए।

विचार करें:-- गीता अध्याय 3 के श्लोक 33-34 में कहा है कि शिक्षित व्यक्ति जो तत्वज्ञान हीन हैं वे मूढ़ स्वभाव वश आँखों देखकर भी सत्य को स्वीकार नहीं करते तथा उन चातुर (शिक्षित) व्यक्तियों के अनुयाई भी अपने स्वभाववश सत्य को स्वीकार न करके उन चालाक गुरूओं के साथ ही चिपके रहते हैं वे भी मूढ़ हैं। समझाने से भी नहीं मानते। हठ करके भी उन्हें समझाना अति कठिन है। कबीर परमेश्वर से तत्वज्ञान प्राप्त करके सन्त गरीबदास जी महाराज ने कहा है:-

गरीब चातुर प्राणी चोर हैं, मूढ़ मुगध हैं ठोठ। सन्तों के नहीं काम के इनको दे गल जोट।।

भावार्थ:- जो व्यक्ति तत्वज्ञान को सुनकर सद्ग्रन्थों में आँखों देखकर भी अभिमानवश यथार्थ भक्ति मार्ग स्वीकार नहीं करते, वे चालाक प्राणी परमात्मा के चोर हैं। जो उनके अनुयाई हैं, वे भी सत्य को आँखों देखकर भी उन चालाक गुरूओं को नहीं त्यागते। वे मूढ़ हैं। ऐसे व्यक्ति संतों के काम के नहीं हैं। परमात्मा उनको एक-दूसरे से बाँधे रखे अर्थात् वे शुभ कर्महीन हैं। उनके भाग्य में सत्य साधना नहीं है। तत्वदर्शी संतों को चाहिए कि उनके साथ अधिक ज्ञान चर्चा न करें। कबीर जी ने कहा है कि:-

कबीर, मूर्ख के समझावतें, ज्ञान गांठी का जाय। कोयला ना उजला, चाहे सौ मन साबुन लाय।।

भावार्थ:- कबीर परमेश्वर जी ने कहा है कि मूर्ख को समझाने से अपने तत्वज्ञान को न गवाऐं यानि चतुर लोग आपके तत्वज्ञान को सुनकर स्वयं वक्ता बनकर जनता को ठगेंगे। मूर्ख मानेगा नहीं। जैसे कोयला अंदर तक काला होता है। कोयले को चाहे सौ मन (400 कि.ग्रा.) साबुन लगाकर साफ करना चाहे तो भी सफेद नहीं होगा। इसी प्रकार मूर्ख व्यक्ति तत्वज्ञान नहीं समझेगा।

इसी अध्याय 3 श्लोक 33-34 में यह भी कहा है कि राग द्वेष नहीं करना चाहिए। स्वयं भगवान कृष्ण जी पाण्डवों के राग में महाभारत के युद्ध के दौरान अश्वत्थामा (द्रौणाचार्य के पुत्र) के बारे में युधिष्ठिर से भी झूठ बुलवाई तथा बबरिक (जिसे श्याम जी भी कहते हैं) का सिर कटवाया कहीं बबरिक पाण्डवों को पराजित न कर दे। क्योंकि बबरिक एक बलशाली योद्धा तथा धनुषधारी था जिसने एक ही तीर से पीपल के पेड़ के सभी पत्ते छेद दिए थे और प्रतिज्ञा कर रखी थी कि जो सेना हारती दिखाई देगी, उसी के पक्ष में युद्ध करूंगा। कृष्ण जी में प्रवेश काल ने पाण्डवों को विजयी करना था।

एक समय भस्मागिरी ने भगवान शिव को वचन बद्ध करके भस्म कंडा मांग कर शिव को मारना चाहा था। पार्वती को पत्नी बनाने का दुष्विचार करके शिव के पीछे भागा तो भगवान श्री विष्णु जी ने शिव जी के राग में पार्वती का रूप बनाया तथा भस्मागिरी को गंडहथ नाच नचा कर भस्म किया। ‘‘गरीब, शिव शंकर के राग में, बहे कृष्ण मुरारी।‘‘ राग द्वेष से भगवान भी नहीं बचे क्योंकि पाण्डवों से राग तो कौरवों से द्वेष तथा शिवजी से राग तो भस्मागिरी से द्वेष स्वयं सिद्ध है। आम प्राणी (अर्जुन) कैसे राग द्वेष से बच सकता है? द्वेष बिना युद्ध हो ही नहीं सकता। इससे सिद्ध है कि गीता जी में अध्यात्म ज्ञान तो काल भगवान (ब्रह्म) ने सही दिया परंतु जीव में विकार (काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार, राग-द्वेष तथा शब्द-स्पर्श, रूप, रस, गंध) भर दिए जिनसे परवश होकर भगवान काल के अवतार भी विवश हो गए जिसके कारण काल जाल से नहीं निकल  कते। इसको (काल को) डर बना रहता है कि कहीं जीव तेरे जाल से निकल न जाएं। इसलिए तत्वज्ञान सुनकर पूर्ण सन्त की शरण ग्रहण करके पूर्ण परमात्मा की भक्ति करो, तब राग-द्वेष समाप्त होंगे।

गीता अध्याय दिव्य सारांश | Gita Adhyay