Shrimad Bhagavad Gita - Summary

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 3 - दूसरों की दिखावटी घटिया साधना से अपनी शास्त्राविधि अनुसार साधना अच्छी (6)

दूसरों की दिखावटी घटिया साधना से अपनी शास्त्राविधि अनुसार साधना अच्छी

गीता अध्याय 3 श्लोक 35 का भावार्थ:- गीता अध्याय 3 के श्लोक 35 में कहा है कि दूसरों की गलत साधना (गुण रहित) जो शास्त्रानुकूल नहीं है। चाहे वह कितनी ही अच्छी नजर आए या वे अज्ञानी चाहे आपको कितना ही डराये उनकी साधना भयवश होकर स्वीकार नहीं करनी चाहिए। अपनी शास्त्रानुकूल गुरु जी द्वारा दिया गया उपदेश पर दृढ़ विश्वास के साथ लगे रहना चाहिए। विचलित नहीं होना चाहिए। अपनी सत्य पूजा अंतिम श्वांस तक करनी चाहिए तथा अपनी सत्य साधना में मरना भी बेहतर है। 

मान बड़ाई जान की दुश्मन

विचार करें:-- गीता अध्याय 3 के श्लोक 33, 34 का भावार्थ है कि सर्व प्राणी प्रकृति (माया) के वश ही हैं। स्वभाववश कर्म करते हैं। ऐसे ही ज्ञानी भी अपनी आदत वश कर्म करते हैं फिर हठ क्या करेगा?

सार: -- अज्ञानी अपनी गलत पूजा को नहीं त्यागते चाहे कितना आग्रह करें, चाहे सद्ग्रन्थों के प्रमाण भी दिखा दिए जाऐं वे नहीं मानते। इसी प्रकार ज्ञानी-विद्वान पुरुष मान वश पैसा प्राप्ति व अधिक शिष्य बनाने की इच्छा के कारण गलत त्यागकर सच्चाई का अनुसरण नहीं करते। दोनों (ज्ञानी व अज्ञानी) स्वभाव वश चल रहे हैं। इसलिए भक्ति मार्ग गलत दिशा पकड़ चुका है। इन दोनों को समझाना व्यर्थ है।

गरीब, चातूर प्राणी चोर हैं, मूढ मुग्ध हैं ठोठ। संतों के नहीं काम के, इनकूं दे गल जोट।।

भावार्थ:- संत गरीबदास जी ने बताया है कि तत्वज्ञानहीन गुरूजन शास्त्रों को ठीक से न समझकर उनके विपरित अध्यात्म ज्ञान बताते हैं तथा शास्त्रों के विरूद्ध भक्ति विधि बताते हैं। उनके अनुयाई अपने अज्ञानी गुरूजनों द्वारा बताए ज्ञान तथा साधना पर लगे हैं। तत्वदर्शी संत उन अज्ञानी गुरूओं से निवेदन करता है कि आप शास्त्रा विरूद्ध अपनी इच्छा से मनमाना आचरण कर रहे हो। शास्त्रों से प्रमाण दिखाता है। प्रमाणों को आँखों देखकर भी अज्ञानी गुरूजन सत्य को स्वीकार नहीं करते। अपना अपमान होने के भय से अपने अनुयाईयों को भी भ्रमित करते हैं कि यह संत झूठ बोल रहा है। इसकी बातों में न आना। हम जो ज्ञान तथा समाधान बता रहे हैं, यह सब शास्त्रा प्रमाणित है। तत्वदर्शी संत उनके अनुयाईयों को शास्त्रों के प्रमाण दिखाकर उनकी भक्ति विधि को गलत सिद्ध करता है तो भी वे मूढ़ अंध श्रद्धालु कहते हैं कि हमारे गुरू जी जो साधना बताते हैं, वह सत्य है। ऐसे व्यक्तियों के विषय में संत गरीबदास जी ने बताया है कि वे फर्जी संत तो चातुर हैं यानि हेराफेरी मास्टर हैं। वे अपनी दुकान चलाने के लिए आँखों देखकर भी सत्य स्वीकार नहीं करते और अपनी प्रत्यक्ष झूठी साधना को सत्य मानते हैं। वे परमात्मा नहीं चाहते। वे मान-बड़ाई तथा धन के लोभी चतुर व्यक्ति हैं तथा अनुयाई उनके ऊपर मोहित हैं। सत्य देखकर भी नहीं मानते। वे ठेठ मूढ़ हैं यानि पूर्ण रूप से मूर्ख हैं। ऐसे व्यक्ति तत्वदर्शी संतों के काम के नहीं हैं। उन दोनों गुरू-शिष्यों को समझाना व्यर्थ में समय व्यर्थ करना है। उनका गला जोट दो यानि उनको एक-दूसरे से चिपके रहने दो। गल जोट करने का भावार्थ है जैसे व्यापारी लोग काटड़ों (भैंस के नर बच्चों) को गाँव से मोल लेकर कसाईयों को बेचने के लिए जाते थे। उस समय व्यापारी लोग पशुओं को पैदल लाते-ले जाते थे क्योंकि वाहन नहीं बने थे तो पशुओं (काटड़ों व जो भैंस बांझ होती थी, उनको) को रस्से के साथ एक-दूसरे को गले से बाँध देते थे। कारण था कि इस प्रकार बाँधने से वे इधर-उधर भागकर मालिक को परेशान नहीं कर पाते थे। ऐसे गुरू तथा शिष्य काल कसाई के पास जाते हैं। ये ऐसे-ऐसे इकट्ठे रहेंगे तो तत्वदर्शी संतों को बाधा नहीं करेंगे यानि इनके साथ अधिक छेड़छाड़ करना ठीक नहीं।

विवेचन:- मेरे यानि रामपाल दास के अतिरिक्त अन्य सब अनुवादकों ने गीता अध्याय 3 श्लोक 35 का अर्थ गलत किया है जो इस प्रकार किया है:-

अच्छी प्रकार में लाये हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारक है। दूसरे का धर्म भय देने वाला है।

विचार करें कि यदि यह अनुवाद सही है तो गीता के अठारह अध्यायों के ज्ञान की क्या आवश्यकता थी? फिर तो जो जैसी साधना कर रहा है, करता रहे। गीता अध्याय 7 श्लोक 12-15 तथा 20-23 में कहा है कि तीनों गुणों यानि श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शिव से मिलने वाले लाभ के द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है यानि जो इन देवताओं की पूजा पर दृढ़ हैं। अन्य किसी की बात नहीं सुनते। वे राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूर्ख मेरी भक्ति भी नहीं करते। जिन देवताओं की भक्ति अज्ञानी जन करते हैं। उनकों मैंने ही कुछ शक्ति दे रखी है, परंतु उन अज्ञानियों को उस साधना का फल क्षणिक यानि शीघ्र समाप्त होने वाला है।

फिर गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में यह ज्ञान देने की क्या आवश्यकता थी कि शास्त्राविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करते हैं, उनको न तो सुख प्राप्त होता है, न सिद्धि प्राप्त होती है, उन उनकी गति यानि मुक्ति होती है अर्थात् व्यर्थ साधना है। गीता अध्याय 16 श्लोक 24 में कहा है कि इससे तेरे लिए अर्जुन कर्तव्य अर्थात् जो आध्यात्मिक कर्म करने चाहिऐं तथा अकर्तव्य अर्थात् जो कर्म नहीं करने चाहिऐं, की व्यवस्था में शास्त्रा ही प्रमाण हैं। पाठकों से निवेदन है कि गीता अध्याय 3 श्लोक 35 का वास्तविक अर्थ पहले किया है, वह ठीक है।

अध्याय 3 श्लोक 36-43 तक का भावार्थ है कि श्लोक 36 में अर्जुन ने प्रश्न किया कि ‘‘हे भगवान! यह मनुष्य न चाहता हुआ भी परवश हुआ पाप आचरण में कैसे लग जाता है?’’ गीता ज्ञान दाता ने श्लोक नं. 37 से 43 में उत्तर दिया है कि तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव) के प्रभाव से प्रेरित होकर मानव अज्ञान को प्राप्त हो जाता है। फिर काम (sex), क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार वश होकर पाप आचरण करता है। मन इन सब पापों को करवाने वाला इन्द्रियों का मुखिया है। इस मन रूपी शत्राु को तत्वज्ञान से मार डाल।

विशेष:- अध्याय 3 का श्लोक 36 में अर्जुन पूछता है कि न चाहते हुए भी मनुष्य पाप कर्म कर देता है। जैसे कोई बलपूर्वक (जबरदस्ती) करवा रहा हो, कृप्या इसका कारण बताईए?

विशेष विवरण:-अध्याय 3 का श्लोक 37 से 43 तक का उत्तर है कि काम (सैक्स) जीव की बुद्धि पर छा जाता है, जिस कारण से ज्ञान समाप्त हो जाता है। इसलिए बुद्धि द्वारा मन को वश कर काम (सैक्स) को मार।

गीता अध्याय दिव्य सारांश | Gita Adhyay