Shrimad Bhagavad Gita - Summary

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 4 - दिव्य सारांश् (1)

श्रीमद् भगवद् गीता - चैथा अध्याय

दिव्य सारांश्

गीता जी के अध्याय 4 के श्लोक 1 से 3 में गीता ज्ञान दाता ने कहा कि मैंने इस अविनाशी योग को अर्थात् यह गीता वाला अध्यात्मिक ज्ञान को सूर्य देव से कहा था। सूर्य ने अपने पुत्रा मनु से कहा तथा मनु ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु से कहा। इस प्रकार यह परम्परा कुछ समय तक चली वर्तमान में यह श्रेष्ठ ज्ञान बहुत समय से लगभग लुप्त हो गया था। तू मेरा प्रिय मित्रा है। इसलिए मैंने वही ज्ञान तुझे कहा है। यह रहस्यमय अर्थात् गुप्त रखने योग्य है।

विचार करें: ज्ञान को गुप्त रखने योग्य क्यों कहा? क्यांेकि यदि आम जीव को काल के जाल का पता लग जाए तो काल लोक खाली हो जाएगा।

विशेष:- यहाँ सूर्य शब्द इस आग के गोले के लिए नहीं है। एक देवता है जिसका नाम सूर्य है, जैसे पृथ्वी पर भी किसी का नाम सूर्यकान्त, सूरज आदि होता है। अध्याय 4 के श्लोक 4 में अर्जुन ने पूछा कि आपका जन्म तो अब का है परंतु सूर्य देव का जन्म तो बहुत पहले का है। यह कैसे हो सकता है कि आपने ही यह ज्ञान कल्प की आदि में उत्पन्न सूर्य को दिया?

गीता ज्ञान बोलने वाला भी जन्मता-मरता है 

अध्याय 4 के श्लोक 5 से 9 तक गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि अर्जुन तेरे तथा मेरे बहुत जन्म हो चुके हैं। इन सबको तू नहीं जानता, मैं जानता हूँ। मैं मनुष्य की तरह जन्म न लेने वाला अविनाशी आत्मा होते हुए तथा सर्व (इक्कीस ब्रह्मण्ड के) प्राणियों का स्वामी होते हुए भी अपनी प्रकृति (अष्टांगी दुर्गा) को आधीन करके माया के गोविन्द श्री ब्रह्मा - श्री विष्णु - श्री शिव को उत्पन्न करता हूँ। उन्हीं में से अंश अवतार रूप में श्री कृष्ण-श्री राम, श्री परसुराम आदि (सृजामि) रचता हूँ तथा उनमें गुप्त रूप से प्रकट होता हूँ।

{श्री विष्णु पुराण (गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित) के चतुर्थ अंश के अध्याय 2 श्लोक 21-26 में पृष्ठ 168 पर प्रमाण है कि एक समय देवताओं तथा राक्षसों का युद्ध हुआ। देवता हार गए।

पुनः साधना करने लगे तो काल ब्रह्म अपने पुत्र विष्णु जी के रूप में प्रकट होकर बोला कि जो तुम्हारा अभिष्ट है, वह मैंने जान लिया है। तुम लोग राजा पुरंजय को युद्ध के लिए तैयार करो। मैं उसके शरीर में प्रविष्ट होकर राक्षसों को मार डालूंगा। ऐसा ही किया।

श्री विष्णु पुराण के चतुर्थ अंश के अध्याय 3 श्लोक 4-6 में पृष्ठ 173 पर एक अन्य प्रमाण भी है:- एक समय नागवंशियों के बहुमूल्य हीरे, खजाने आदि-आदि गंधर्वों ने लूट लिए तथा उनके राज्य पर भी कब्जा कर लिया। नागाओं की विनती स्वीकार करके काल ब्रह्म अपने पुत्रा श्री विष्णु जी के रूप में प्रकट होकर बोला कि आप मानधाता राजा के पुत्रा पुरूकुत्स को युद्ध के लिए तैयार करो। मैं उस पवित्रा राजा के शरीर में कुछ समय के लिए प्रविष्ट होकर दुष्ट गंधर्वों को नष्ट कर दूँगा। ऐसा ही हुआ। इसी प्रकार श्री कृष्ण जी के शरीर में प्रकट होकर गीता का ज्ञान काल ब्रह्म ने बोला।}

गीता अध्याय 4 श्लोक 7:- गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि जब-2 धर्म की हानि तथा अधर्म की वृद्धि होती है, तब-2 मैं अपने अंश अवतार (सृजामि) रचता हूँ और वह अवतार साधुओं की रक्षा तथा असाधुओं का संहार करने के लिए प्रकट हुआ करते हैं। पवित्रा गीता बोलने वाला काल ब्रह्म कह रहा है कि अर्जुन मेरी भी जन्म-मृत्यु होती है। इसे तू नहीं जानता, मैं जानता हूँ। यही प्रमाण गीता अध्याय 10 श्लोक 2 में है जिस में कहा है कि मेरी उत्पत्ति को मेरे से उत्पन्न ऋषि देवता आदि नहीं जानते। अध्याय 4 श्लोक 9 में स्पष्ट किया है कि मेरे जन्म अलौकिक हैं। यह ब्रह्म (काल) एक ब्रह्मलोक रचकर उसमें तीन रूपों (महाब्रह्मा, महाविष्णु, महाशिव) में रहता है। इसकी जन्म-मृत्यु होती है। यह महाशिव रूप में तब मरता है जब इसी का पुत्रा त्रिलोकीय शिव 70000 (सत्तर हजार) बार मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। इसलिए अपने जन्म व मृत्यु को अलौकिक कहा है। 
अधिक जानकारी के लिए कृप्या पढ़ें प्रलय की जानकारी (इसी पुस्तक के पृष्ठ नं 163 से 168 पर।) हे अर्जुन! मेरे जन्म व कर्म अद्धभुत हैं जो कोई इस प्रकार तत्व से नहीं जान लेता है वह शरीर त्याग कर मेरे जाल में फंसा रह जाता है। (उसको कुछ समय स्वर्ग-महास्वर्ग में रख कर फिर जन्म-मरण के चक्र में डाल देता है।) जो मुझ काल को तत्व से जान लेता है उस पूर्णज्ञानी का पुर्नजन्म नहीं होता।

विशेष: - गीता जी के अध्याय 2 के श्लोक 12 में तथा इसी अध्याय 4 के श्लोक 5 तथा 9 में प्रत्यक्ष प्रमाण है कि गीता ज्ञान दाता तथा इसके पुजारी का जन्म-मरण बना रहेगा, फिर अध्याय 9 के श्लोक 7 में कहा है कि कल्प के अंत में सर्व प्राणी तथा स्वर्ग-नरक व पृथ्वी लोक तक नष्ट हो जाते हैं। फिर कल्प के प्रारम्भ में मैं रचूंगा अर्थात् अस्थाई जन्म-मरण समाप्त हुआ, स्थाई नहीं। काल ब्रह्म अच्छी आत्माओं को रचता है अर्थात् पैदा करता है। फिर उनमें स्वयं प्रवेश करके गुप्त रूप से अपना उल्लू सीधा कर लेता है तथा अपने आपको आकार में प्रकट नहीं करता। इसका अटल अविनाशी नियम है कि वह अपने वास्तविक रूप में कभी प्रकट नहीं होता। (प्रमाण गीता जी के अध्याय 7 के श्लोक 24, 25 में।)

तीन लोक के सर्व प्राणी इस (काल) के अधीन हैं। यह इनका मालिक है। इसलिए कह रहा है कि मैं धर्म की हानि होने पर पाप कर्मी प्राणियों को मारने के लिए ख्राजा पुरंजय में प्रवेश करके काल ब्रह्म ने राक्षसों को मार डाला जो देवताओं को सताया करते। राजा पुरूकुत्स के शरीर में प्रविष्ट होकर गंधर्वों को मार डाला जो नागवंशियों को सताया करते थे। परशुराम जी के शरीर में प्रवेश करके क्षत्रियों का सफाया कर दिया। फिर दुर्वासा जी में प्रवेश करके शाॅप के द्वारा 56 करोड़ यादवों समेत भगवान कृष्ण व कृष्ण जी के परिवार समेत नष्ट कर दिया यानि खा गया। कपिल मुनि में प्रवेश करके साठ हजार राजा सगड़ के पुत्रों का सफाया कर दिया। इसी प्रकार राजा मानधाता की बहत्तर क्षौहिणी सेना को चुणक ऋषि में प्रवेश करके दुःखदाई तत्वों को नष्ट किया तथा धर्म की रक्षा की तथा श्री कृष्ण में प्रवेश करके महाभारत जैसा भयंकर युद्ध करवा दिया तथा स्वयं गुप्त रहा।, अपने अंश प्रकट करता हूँ। मेरे जन्म व कर्म अद्धभुत हैं। जो व्यक्ति मुझे इस प्रकार जान लेता है, वह ब्रह्मा, विष्णु, महेश (तीनों गुणों) को छोड़कर मेरा ही स्मरण करता है और मेरे को ही प्राप्त होता है अर्थात् मेरा ही आहार होता है। (काल अपने भक्त को महास्वर्ग यानि ब्रह्मलोक में भेजकर कुछ लम्बे समय तक जन्म मरण से बचा देता है। फिर चैरासी लाख प्रकार की जूनियों में डाल देता है तथा जो इसके मायाजाल को तत्व से जान लेता है उसका पुनर् जन्म नहीं होता है क्योंकि वे भक्त पूर्ण सन्त अर्थात् तत्वदर्शी सन्त की शरण में जा कर पूर्ण परमात्मा की भक्ति करके पूर्ण मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।)

गीता अध्याय दिव्य सारांश | Gita Adhyay