Shrimad Bhagavad Gita - Summary

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 4 - पूर्ण ज्ञानी काल जाल में नहीं रहते (2)

पूर्ण ज्ञानी काल जाल में नहीं रहते

अध्याय 4 के श्लोक 10 से 15 में काल ब्रह्म ने कहा है कि जिनके राग द्वेष मर गए हैं जिसने मुझे यहाँ 21 ब्रह्मण्ड के कर्मों का कत्र्ता तथा मालिक हूँ, ऐसे तत्व से जान लिया है। वह मतावलम्बी हो चुके हैं। ख्नोट: वे तीनों मंत्रों के उपासक कबीर हंस हैं जो सत्यनाम व सारनाम सुमरण करके काल के यथार्थ स्वरूप को देख कर उसके सिर पर पैर रख कर पार (सतलोक में चले जाते हैं) हो जाते हैं।, जैसे गीता अध्याय 7 श्लोक 17 में कहा है कि ज्ञानी मुझे अच्छे लगते हैं तथा मैं ज्ञानी को प्रिय हूँ। क्योंकि वे तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी) की उपासना न करके मेरी अर्थात् ब्रह्म की भक्ति करते हैं, इसी प्रकार यहाँ गीता अध्याय 4 श्लोक 11 में कहा है कि जो मुझे भजते हैं मैं उन्हें भजता हूँ अर्थात् मुझे अच्छे लगते हैं यही प्रमाण गीता अध्याय 16 व 17 में विस्तृत है। फिर कहा है कि जो मुझे अच्छी तरह जान लेता है वह फिर मेरे जाल में नहीं फँसता है तथा जो देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) की साधना करते हैं वे जल्दी प्रकट हो कर उन्हें कुछ राहत दे देते हैं परंतु पूर्ण मुक्त नहीं कर सकते। इसलिए तू अपने पूर्वजों की तरह शास्त्रानुकूल भक्ति कर्म कर।

कर्मों के बन्धन से त्रिलोकी नाथ भी नहीं बचे।।

अध्याय 4 के श्लोक 16 से 22 में कर्मों का विवरण कहा है कि जो व्यक्ति जिस किसी कर्म को करे, उसमें कत्र्तापन का अभिमान नहीं लाए तथा कहे कि कर्म मालिक आपके आश्रित होकर कर रहा हूँ। कर्म-अकर्म का ज्ञान इस तुच्छ जीव को नहीं है। जो निष्काम भावना से कर्म करता है वह पंडित (विद्वान) है तथा कर्मों के बन्धन में नहीं बन्धता। इसीलिए इसी अध्याय के श्लोक 34 में कहा है कि तत्वज्ञान से ही सर्व कर्मों का ज्ञान होगा कि कौन प्रभु पूजा के योग्य है, कौन नहीं? फिर
साधक ब्रह्म द्वारा लगाए कर्मों के बन्धन में न बन्ध कर सत्यलोक में चला जाता है। वह सदा के लिए कर्म बन्धन से मुक्त हो जाता है।

काल ब्रह्म तक के ज्ञान से तो कर्म बन्धन से मुक्ति नहीं मिलती। वे तो भोगने ही पड़ते हैं। विचार करें भगवान विष्णु से बढ़ कर कौन विद्वान हो सकता है? उनका भी कर्म बन्धन में बंध कर श्री रामचन्द्र रूप में जन्म हुआ। क्योंकि श्री विष्णु जी ने महर्षि नारद जी को बन्दर का मुख लगाया जिस कर्म के अनुसार नारद जी ने भगवान विष्णु जी को शाप दिया। जिसके बन्धन के अनुसार राजा दशरथ के घर जन्म लिया फिर वनवास हुआ तथा बाली का वध किया। बाली वध के कर्म बन्धन में बंध कर श्री कृष्ण के रूप में वही विष्णु आत्मा का द्वापर युग में जन्म हुआ। फिर बाली की आत्मा जो उस समय एक शिकारी बना था ने उस कर्म का बदला श्री कृष्ण जी के पैर में तीर मार कर लिया। उसी कर्म बन्धन में बंध कर कृष्ण रूप में जन्मना पड़ा।

कर्म बन्धन से केवल परमेश्वर कबीर बन्दी छोड़ ही छुड़वा सकते हैं। इसलिए उन्हें बन्दी छोड़ कहा जाता है। पवित्रा यजुर्वेद अध्याय 5 मंत्रा 32 में तथा यजुर्वेद अध्याय 8 मंत्र 13 में भी प्रमाण है (कविरंघारिरसि) कबीर परमेश्वर पाप का शत्राु है अर्थात् पाप विनाशक है (बम्भारिरसि) वह कबीर परमेश्वर बन्धनों का शत्राु है अर्थात् काल के कर्म बन्धन रूपी कारागार से छुड़वाने वाला बन्दी छोड़ है। ‘‘अमर करूं सतलोक पठाऊँ। तातें बन्दी छोड़ कहाऊँ।।‘‘

अध्याय 4 के श्लोक 23-24 का भाव है कि जो साधक सर्व कर्म परमात्मा को साक्षी रख कर कर रहा है उसके सर्व कर्म ब्रह्म (परमात्मा) जैसे होते हैं। चूंकि वह तत्व ज्ञानी साधक शास्त्रा विधि रहित मनमाना आचरण नहीं करता। इसलिए उसके वचन कर्म परमात्मा के गुणगान करने में तथा सर्व समय प्रभु चिन्तन में ही लीन रहता है। पूर्ण विचार कर कार्य करता है।

गीता अध्याय दिव्य सारांश | Gita Adhyay