Shrimad Bhagavad Gita - Summary

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 4 - जो जैसी साधना करता है, उसे ही गलती से पापनाशक जानता है (3)

जो जैसी साधना करता है, उसे ही गलती से पापनाशक जानता है 

अध्याय 4 के श्लोक 25 से 30 तक में कहा है कि इनमें भिन्न-2 प्रकार की कर्म उपासना का विवरण किया है। कहा है कि कुछ साधक तो हवन यज्ञ करके कर्मयोग को कर रहे हैं, कुछ एक स्थान पर विशेष आसन पर बैठ कर कान,नाक,आँख आदि इन्द्रियों को हठ करके रोक कर संयम करने की साधना में लगे हैं। अन्य भक्तजन देवी-देवताओं की भक्ति करते हैं। कुछ दान, कुछ घोर तप करते हैं। कुछ व्रत कर रहे हैं, कुछ अन्य अभ्यास तथा स्वाध्याय (धार्मिक शास्त्रा पढ़ना) कर्म श्रेष्ठ मान कर आध्यात्मिक कर्मों में संलग्न हैं तथा अन्य प्राणायाम कर रहे हैं और मान रहे हैं कि ये सर्व भक्ति कर्म पाप नष्ट करने वाले हैं।

विचार करें:- भगवान कृष्ण अर्जुन के गुरु रूप में थे। (जैसा कि गीता जी के अध्याय 2 के श्लोक 7 में स्वयं अर्जुन कह रहा है कि मैं आपकी शरण हूँ तथा आपका शिष्य हूँ।) जब युधिष्ठिर को भयानक स्वपन आने लगे तब श्री कृष्ण (गुरु) जी से कारण व समाधान पूछा था। भगवान ने कहा था कि आपको युद्ध में किए पाप दुःखदाई हो रहे हैं। इसका समाधान यज्ञ ही बताया था। यज्ञ की गई। फिर भगवान कृष्ण के पैर में बालिया नामक शिकारी जो बाली की आत्मा थी, ने तीर मारा। उस समय श्री कृष्ण जी ने अर्जुन व सर्व पाण्डवों को कहा कि आप हिमालय में जा कर आसक्ति रहित हो कर मोह ममता त्याग कर तप साधना इन्द्रियों पर काबू पाकर संयम रखते हुए करना। आपके (पाण्डवों के) सर्व पाप समाप्त हो जाएंगे। पाण्डवों ने ऐसा ही किया परंतु फिर भी नरक में गिरे। महाभारत ग्रन्थ में प्रमाण है। इससे सिद्ध है कि वेदों व गीता जी में वर्णित साधना से पाप विनाश नहीं होते, भोगने ही पड़ते हैं। अन्य उपलब्धियाँ जैसे सिद्धियाँ व स्वर्ग-महास्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है। परंतु पाप कर्म नहीं कटते क्योंकि वेदों तथा गीता का ज्ञान अधूरा है। 

संत गरीबदास जी ने परमेश्वर कबीर जी से प्राप्त तत्वज्ञान में बताया है कि:-

गरीब, ऋग यजु साम अथर्वण, चारों वेद चितभंगी रे। सूक्ष्म बेद साहेब का बांचै, सो हंसा सत्संगी रे।।

भावार्थ:- वेदों में लिखा है कि नेति यानि ‘‘न इति’’ अर्थात् जो ज्ञान चारों वेदों में है, यह सम्पूर्ण नहीं है। इस अध्यात्म ज्ञान का वेदों में अंत नहीं (न इति) है। इसीलिए वाणी में कहा है कि ऋग्वेद-यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद का ज्ञान अधूरा होने से चितभंगी है यानि बुद्धि में भ्रम उत्पन्न करने वाला है। सम्पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान स्वयं परमेश्वर जी ने बताया है, वह यथार्थ है। जो पुण्यात्मा उस सूक्ष्मवेद को पढ़ता है, उसके पास सत्य ज्ञान है, वह सत्संगी है। सूक्ष्मवेद को तत्वज्ञान भी कहा जाता है जिसका वर्णन इसी अध्याय 4 श्लोक 32 तथा 34 में है। जैसे श्रीमद्भगवत गीता में चारों वेदों का संक्षिप्त ज्ञान है। इसी में बहुत भ्रमित ज्ञान है। जिस कारण से पाठक तथा अनुवादक समझ नहीं पाए कि गीता अध्याय 4 श्लोक 5, अध्याय 2 श्लोक 12, अध्याय 10 श्लोक 2 में गीता ज्ञान दाता अपने को नाशवान बता रहा है। जन्म-मरण सदा बना रहेगा। जबकि हिन्दू धर्म के अनुयाई व धर्मगुरू व प्रचारक गीता ज्ञान दाता श्री कृष्ण जी को मानते हैं। श्री कृष्ण जी को स्वयं विष्णु मानते हैं। श्री विष्णु उर्फ श्री कृष्ण को अविनाशी प्रभु तथा सबसे बड़ा प्रभु मानते हैं। कहते हैं कि श्री कृष्ण जी से यानि श्री विष्णु के ऊपर कोई स्वामी ही नहीं है। ये अखिल ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं। इस प्रकार पाठक को चित भंग हो जाता है यानि भ्रम उत्पन्न हो जाता है कि ऊपर बताए अध्यायों के श्लोकों में तो श्री कृष्ण जी अपने को नाशवान बता रहे हैं। हमने अविनाशी सुना है। गीता अध्याय 7 श्लोक 12-15 तथा 20-23 में त्रिगुण माया यानि रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव आदि-आदि देवताओं की पूजा करने वाले राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूर्ख कहे हैं। अध्याय 7 के ही श्लोक 16-18 में गीता ज्ञान दाता अपनी भक्ति करने को कहता है, परंतु श्लोक 18 में ही अपनी भक्ति से होने वाली गति यानि मुक्ति को अनुत्तम कहा है।

गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में तथा अध्याय 8 श्लोक 3, 8-10, 20-22 में तथा गीता के ही अध्याय 18 श्लोक 46, 61-62, 66 में तथा अन्य अनेकों श्लोकों में गीता ज्ञान दाता ने अपने से अन्य परमात्मा वास्तव में अविनाशी सब जीवों व ब्रह्माण्डों की उत्पत्तिकर्ता सबका धारण-पोषण करने वाला (उत्तमः पुरूषः तू अन्यः) उत्तम परमेश्वर तो अन्य ही बताया है। उसकी शरण में जाने के लिए गीता ज्ञान बोलने वाले ने कहा है। उस परमेश्वर की कृपा से ही सनातन परम धाम प्राप्ति तथा परम शांति प्राप्ति बताई है। वह परमेश्वर कौन है, यह गीता तथा वेदों में स्पष्ट नहीं है। उसकी जानकारी के लिए गीता अध्याय 4 श्लोक 32 तथा 34 में कहा है कि वह परम अक्षर ब्रह्म अपने मुख कमल से वाणी बोलकर तत्वज्ञान बताता है। उसमें यज्ञों यानि धार्मिक अनुष्ठानों का विस्तार ज्ञान उस तत्वज्ञान में बताता है। उसको जानने के पश्चात् साधक पापों से मुक्त हो जाता है। पापों से मुक्त होना पूर्ण मोक्ष होना है। उस तत्वज्ञान को तू तत्वदर्शी संतों से समझ। तत्वज्ञान न वेदों में है, न गीता में है, वह सूक्ष्मवेद में है जो मेरे (रामपाल दास के) अतिरिक्त वर्तमान में विश्व में किसी के पास नहीं है। इसी कारण से गीता के सब अनुवादक तथा पाठक व प्रचारक भ्रमित हैं। श्री कृष्ण जी अर्थात् श्री विष्णु जी को गीता ज्ञान बोलने वाला कहते हैं। इसी को सबसे बड़ा प्रभु कहते हैं जबकि गीता बोलने वाला अपने से श्रेष्ठ प्रभु (उत्तम पुरूष = पुरूषोत्तम) किसी अन्य को कह रहा है। सूक्ष्मवेद में सतनाम तथा सारनाम का वर्णन है।

कहा है कि सतनाम व सारनाम का सुमरण करने वाला उपासक सनातन ब्रह्म (सतपुरुष) को प्राप्त हो जाता है। जिसका जन्म-मरण स्थाई रूप से समाप्त हो जाता है। पूर्ण परमात्मा का साधक अन्य चार यज्ञों के साथ-2 ज्ञान यज्ञ अधिक करता है, ज्ञान यज्ञ सुबह, शाम, दोपहर का स्वाध्याय तथा सतसंग श्रवण व धार्मिक पुस्तकों का पठन तथा साथ-2 गुरु मन्त्रा का जाप भी श्वांस-2 में करता है। उस साधक के पाप विनाश हो जाते हैं तथा अनादि मोक्ष प्राप्त करता है। सम्पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान ‘‘ब्रह्मणः’’ सच्चिदानंद घन ब्रह्म यानि पूर्ण परमात्मा स्वयं पृथ्वी पर प्रकट होकर अपने (मुखे) मुख से बोली वाणी में बताता है जिसका प्रमाण इसी अध्याय 4 के श्लोक 32 में है। आप जी अगले श्लोकों में पढ़ेंगे व जानेंगे तथा सत्य मानेंगे।

गीता अध्याय दिव्य सारांश | Gita Adhyay