Shrimad Bhagavad Gita - Summary

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 4 - नाम के साथ-साथ यज्ञ भी आवश्यक (4)

नाम के साथ-साथ यज्ञ भी आवश्यक

अध्याय 4 के श्लोक 31-32 में कहा है कि गीता अध्याय 4 श्लोक 25-30 तक वर्णित शास्त्राविरूद्ध साधना से बचे हुए साधक शास्त्राविधि अनुसार अर्थात् नाम साधना करते हैं। वे यज्ञ से अलग सतनाम व सारनाम के जाप रूपी आनन्द (अमृत) का अनुभव करने वाले (सनातन ब्रह्म) पूर्ण परमात्मा को प्राप्त होते हैं। यज्ञ भी आवश्यक बताते हुए कहा है कि नाम साधना के साथ पाँचों यज्ञ (धर्म, ध्यान, हवन, प्रणाम, ज्ञान अर्थात् धार्मिक शास्त्रों का पठन पाठन) भी आवश्यक हैं। जैसे सतनाम व सारनाम रूपी बीज बीजकर उसमें यज्ञ रूपी खाद पानी भी अति आवश्यक है। जिससे भक्ति रूपी पौधा परिपक्व होता है। यदि केवल नाम साधना करते रहे यज्ञ नहीं किए तो जैसे पानी और खाद के अभाव से पौधा सूख जाता है, इसी प्रकार यज्ञ न करने से साधक अहंकारी, दयाहीन, श्रद्धाहीन, हो जाता है। वास्तविक जाप मंत्रा बिना केवल यज्ञ करना भी निष्फल है। यदि गुरु जी से नाम नहीं ले रखा है वैसे यज्ञ करता रहे वह भी निष्फल है पूर्ण सन्त से वास्तविक मन्त्रा (सत्यनाम व सारनाम) का उपदेश लेकर नाम जाप तथा पाँचों यज्ञ नहीं करते तो उनको इस लोक में ही कोई लाभ नहीं होगा फिर परलोक में कैसे हो सकता है? भावार्थ है कि पूर्ण सन्त द्वारा दिया पूर्ण भक्ति मार्ग ही लाभदायक है। अर्जुन यज्ञ में प्रतिष्ठित पूर्ण परमात्मा को इष्ट रूप में मान कर यज्ञ करता है तथा यज्ञों के साथ-साथ वास्तविक नाम का सुमरण करके पूर्ण मोक्ष रूपी अमृत को प्राप्त हो
जाता है अर्थात् पूर्ण परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं।

गीता अध्याय 4 श्लोक 32 में कहा है कि पूर्ण परमात्मा द्वारा अपने मुख कमल से सूक्ष्म वेद में सभी यज्ञों यानि धार्मिक अनुष्ठानों का विस्तार पूर्वक विवरण है जो संसारिक कर्तव्य कर्मों तथा शारीरिक यानि शरीर द्वारा दान, सेवा, स्मरण आदि भक्ति कर्मों से सम्पन्न होते हैं। इस प्रकार जान कर साधक मुक्त हो जाता है। उस तत्वज्ञान को मैं (गीता बोलने वाला प्रभु) भी नहीं जानता। जो पूर्ण परमात्मा के पूर्ण मोक्ष मार्ग का विवरण है, उसके लिए अध्याय 4 श्लोक 34 में कहा है कि उस
तत्वज्ञान को जानने वाले संतों की खोज कर।

[नोट:- गीता जी के अन्य अनुवाद कर्ताओं ने गीता अध्याय 4 श्लोक 32 का अनुवाद ठीक नहीं किया है क्योंकि उन्होंने ब्रह्मणः का अर्थ वेद किया है। जबकि गीता अध्याय 17 श्लोक 23 में ब्रह्मणः का अर्थ उन्होंने ही सच्चिदानन्दघन ब्रह्म किया है जो सही है। इसलिए मानव समाज गीता जी के अनमोल ज्ञान के यथार्थ भाव को नहीं समझ सका। ]

गीता अध्याय 4 श्लोक 25 से 30 तक में कहा है कि कुछ साधक देवताओं की पूजा रूपी यज्ञ अर्थात् धार्मिक कर्म करते हैं दूसरे हठयोग द्वारा कर्म इन्द्रियों को साधते हैं दूसरे श्वांस क्रिया करते हैं अन्य घोर तप तथा अहिंसा आदि घोर व्रत करते हैं अन्य दान ही करते हैं दूसरे योगी जन केवल अल्पाहार ही करते हैं। ये सर्व साधक अपनी-2 साधनाओं को पाप नाशक जानते हैं। श्लोक 32 में कहा है कि उपरोक्त साधनाओं सहित पूर्ण मोक्ष मार्ग का ज्ञान सच्चिदानन्दघन ब्रह्म अर्थात् पूर्ण परमात्मा के द्वारा अपने मुख कमल से कहे ज्ञान अर्थात् सच्चिदानन्दघन की वाणी में (सूक्ष्म वेद यानि कविर्वाणीमें) विस्तार से कहा गया है वह तत्वज्ञान है। गीता अध्याय 4 के ही श्लोक 34 में कहा है कि उस ज्ञान को (जो सच्चिदानन्दघन ब्रह्म की वाणी में कहा है उस तत्वज्ञान को) तत्वदर्शी सन्तों से समझ तत्वदर्शी सन्त की पहचान गीता अध्याय 15 श्लोक 1 में बताई है।

गीता अध्याय दिव्य सारांश | Gita Adhyay