Shrimad Bhagavad Gita - Summary

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 4 - तत्वदर्शी संतों से ज्ञान समझकर भक्ति करने से पूर्ण मुक्ति संभव (5)

तत्वदर्शी संतों से ज्ञान समझकर भक्ति करने से पूर्ण मुक्ति संभव

विशेष: अध्याय 4 के श्लोक 33, 34 तथा 35 का भाव है कि गीता ज्ञान दाता ने अर्जुन से कहा हे अर्जुन! इस प्रकार पूर्ण परमात्मा के ज्ञान को व समाधान को जानने वाले तत्वदर्शी संतों के पास जा। उनको आधीनी पूर्वक आदर के साथ दण्डवत् प्रणाम कर प्रेम व विनय पूर्वक उस परमात्मा का मार्ग पूछ। फिर वे संत पूर्ण परमात्मा को पाने की विधि (सतनाम व सारनाम अर्थात् ॐ तत्,सत् का मन्त्रा) बताएगें जिसको जान कर तू फिर इस प्रकार अज्ञान रूपी मोह को प्राप्त नहीं होगा। फिर तू इसी ज्ञान के आधार पर पहले अपने आपको जानेगा कि मैं काल के जाल में कैसे फंसा तथा फिर मुझे (काल रूप से) देखेगा, तब तू यहाँ से निकलने की पूरी चेष्टा करेगा। तत्वदर्शी संत की पहचान गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 तक में देखें। अध्याय 4 के श्लोक 33 में पवित्र श्री मद्भगवत गीता जी को बोलने वाले काल प्रभु ने कहा कि द्रव्यमय यज्ञ {यानि धन से होने वाले धार्मिक अनुष्ठान जो बिना तत्वज्ञान समझे करते हैं जैसे दान देना, धर्म-भण्डारा (लंगर-भोजन करना), वस्त्रा दान करना, कूँए, धर्मशाला, प्याऊ आदि-आदि धर्मार्थ बनवाना} से ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है अर्थात् पहले पूर्ण संत से आध्यात्मिक सम्पूर्ण ज्ञान समझ। फिर उनके द्वारा बताए अनुसार धर्म यज्ञ कर।

उदाहरण:- एक सज्जन पुरूष ने भावुक होकर एक भिखारी को पाँच सौ रूपये दान दे दिए। भिखारी पहले पाव शराब सेवन करता था। उस दिन आधी बोतल पी गया। शेष रूपये भी कहीं गिर गए। प्रतिदिन की तरह पत्नी ने शराब सेवन का विरोध किया तो भिखारी ने पत्नी की पिटाई कर दी। पत्नी ने दोनों बच्चों समेत आत्महत्या कर ली। उस सज्जन को दान से पुण्य के स्थान पर पाप मिला। इसलिए धर्म यज्ञ करने से पहले तत्वज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ बताई है। गीता ज्ञान देने वाला भी उस तत्वज्ञान को नहीं जानता क्योंकि श्लोक 34 में कहा है कि मैं उस पूर्ण परमात्मा के तत्वज्ञान से अनभिज्ञ हूँ अर्थात् मैं नहीं जानता। इसलिए किसी पूर्ण परमात्मा के ज्ञान को जानने वाले ज्ञानी संतों (धीराणाम्) के पास जाकर पूर्ण जानकारी (पूर्णब्रह्म परमात्मा का मार्ग) प्राप्त कर, पहले उन पूर्ण संतों को दण्डवत् प्रणाम करना, फिर उनकी सेवा करना तथा अति आधीनी से विनम्र भाव से पूर्ण परमात्मा को पाने की विधि पूछना। तब वे प्रसन्न हो कर तुझे पूर्ण तत्व ज्ञान समझाएगें तथा नाम उपदेश दे कर कल्याण करेंगे। फिर मुझे समझ पाएगा कि मैं वास्तव में काल हूँ। पहले तो तू अपने आपको समझेगा कि तू कौन है तथा कैसे मेरे (काल के) जाल में फंसा? फिर मुझे (काल समझ कर) विशेष दृष्टिकोण से देखेगा (पहले वाले भाव से नहीं)। जब तुझे पूर्ण परमात्मा का ज्ञान हो जाएगा। (फिर पूरा गुरु तलाश करेगा जो तुझे सत्यनाम व सारनाम देगा)। फिर तू उस तत्वदर्शी संत से तीन मंत्रा का जाप (जिनमें एक ओ3म् $ तत् $ सत् दो सांकेतिक हैं जो वहीं पूर्ण संत बता सकता है) लेकर सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाएगा। जब तुझे मेरा (काल का) पूर्ण ज्ञान हो जाएगा तो पूरी तड़फ करके नाम लेकर भजन करके अग्नि की तरह वह सत्यनाम व सारनाम की लगन पाप को नष्ट करेगी अर्थात् उस परमात्मा में यह शक्ति है कि वह जीव के सर्व पापों को समाप्त कर सकता है जबकि ब्रह्म (काल) ऐसा नहीं कर सकता। जिसको पूर्ण जानकारी हो गई वह परम शांति को प्राप्त हो जाएगा अर्थात् पूर्ण परमात्मा की साधना करके पूर्ण मुक्त हो जाएगा।

जिस भक्त आत्मा का पूर्ण संशय मिट गया उसने अपने आपको पूर्ण परमात्मा को समर्पित कर दिया। वह ज्ञानी व्यक्ति संशय रूपी राक्षस को तत्वज्ञान रूपी तलवार से काट देता है। इसलिए उठ अर्थात् सचेत होकर तत्वदर्शी संत से तत्वज्ञान सुन कर शास्त्रा अनुकूल भक्ति कर्मों पर अडिग हो जा। यही प्रमाण गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 में भी है जिसमें तत्वदर्शी सन्त की पहचान बताई है तथा कहा है कि तत्वज्ञान रूपी शस्त्रा द्वारा अज्ञान को काटकर उस के पश्चात् परमेश्वर के उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ जाने के पश्चात् साधक फिर लौटकर संसार में कभी नहीं आता अर्थात् पूर्ण मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

गीता अध्याय दिव्य सारांश | Gita Adhyay