Shrimad Bhagavad Gita - Summary

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 4 - गीता अध्याय 4 श्लोक 36-42 का सारांश (6)

गीता अध्याय 4 श्लोक 36-42 का सारांश

अध्याय 4 श्लोक 36:- उपरोक्त ज्ञान तथा साधना के करने से साधक (पापेभ्यः) पापियों से (अपी) भी (पापकृतमः) अधिक पाप करने वाला है तो भी तत्वज्ञान रूपी नौका द्वारा पाप के समुद्र से भली-भांति तर जाएगा क्योंकि तत्वदर्शी संत उपरोक्त नाम जाप देते हैं जो सर्व पापों को नष्ट कर देते हैं। पापरहित पवित्रा होकर जीव परमात्मा के पास चला जाता है। 

अध्याय 4 श्लोक 37:- इस श्लोक में कहा है कि तत्वज्ञान को जानकर तत्वदर्शी संत से नाम दीक्षा लेकर साधना करने से साधक के पाप कर्म ऐसे भस्म हो जाते हैं जैसे अग्नि ईंधन को जलाकर भस्म बना देती है। भावार्थ है कि तत्वज्ञान बताने वाला संत साधना भी बताएगा जिससे पाप नष्ट हो जाऐंगे। साधक भविष्य में कोई पाप कर्म नहीं करता।

सूक्ष्मवेद में भी कबीर जी ने कहा है कि:-

कबीर, जब ही सतनाम हृदय धरो, भयो पाप का नाश। जैसे चिंनगी अग्नि की, पड़ै पुराने घास।।

भावार्थ:- पूर्ण गुरू से दीक्षा लेकर सच्चे मन से मर्यादा में रहकर सतनाम का जाप करने से पाप ऐसे नष्ट हो जाते हैं जैसे पुराने सूखे घास में आग की चिंगारी गिर जाए तो घास जलकर भस्म बन जाता है।

अध्याय 4 श्लोक 38:- इसलिए इस संसार में तत्वज्ञान के समान कोई पवित्रा करने वाला नहीं है जो सम्पर्क में आने वाले को शुद्ध कर देता है। उस ज्ञान के आधार से तत्वदर्शी संतों के सम्पर्क में आकर शुद्ध अन्तःकरण हुआ भक्त स्वयं ही अपना अनुभव (विन्दति) बताता है।

अध्याय 4 श्लोक 39:- तत्वज्ञानी इन्द्रियों पर संयम करके (तत्) उससे (परः) आगे का (ज्ञानम्) सूक्ष्मवेद वाला सम्पूर्ण ज्ञान (लभते) प्राप्त करता है। उस तत्वज्ञान को तत्वज्ञानी से प्राप्त करके साधक शीघ्र ही (पराम्) ब्रह्म साधना से होने वाली गति से दूसरी गति से होने वाली परम शांति को प्राप्त हो जाता है।

अध्याय 4 श्लोक 40:- विवेकहीन यानि जिसको तत्वज्ञान नहीं मिला, उसका संशय समाप्त नहीं होता है। वह सत्य मार्ग से अवश्य भटककर नष्ट हो जाता है। संशययुक्त व्यक्ति के लिए न यह लोक सुखदायक, न परलोक ही सुखदायक है।

अध्याय 4 श्लोक 41:- हे धनंजय! जिसने तत्वज्ञान सुनकर विवेक द्वारा संशय का नाश कर लिया है जिसने सर्व भक्ति कर्म परमात्मा पर छोड़ दिए हैं। वह पुनः पापकर्म नहीं करता। जिस कारण से वह कर्मों के बन्धन में नहीं बँधता।

अध्याय 4 श्लोक 42:- इस प्रकार विचार करके हे भारत! अपने हृदय में उत्पन्न अपने संशय को ज्ञान रूपी तलवार से काटकर (योगम् आतिष्ठ) भक्ति कर्म में स्थित होकर (उतिष्ठ) साधना के लिए खड़ा हो जा यानि भक्ति के लिए कमर कस ले।

विवेचन:- गीता अध्याय 4 के श्लोक 42 के अनुवाद में मेरे (लेखक-अनुवादक) के अतिरिक्त सर्व अनुवादकों ने अपने अनुवाद में लिखा है कि युद्ध के लिए खड़ा हो जा जो गलत है क्योंकि पूरे अध्याय 4 में परमात्मा के तत्वज्ञान तथा अज्ञान का विश्लेषण है। स्पष्ट किया है कि शास्त्राविरूद्ध अधूरे व मनमाने भक्ति कर्मों को तत्वज्ञान से समझकर उनको त्यागकर पूर्ण परमात्मा द्वारा अपने मुख कमल से बताये तत्वज्ञान को तत्वदर्शी संतों से समझकर कर्तव्य भक्ति कर्म कर। फिर विवेक रूपी तलवार से अज्ञान को काटकर तत्वज्ञान के आधार से (योगम्) साधना में (आतिष्ठ) स्थित हो जा। भक्ति के लिए (उतिष्ठ) खड़ा हो जा यानि सत्य साधना के लिए कमर कस ले। विचारणीय विषय तो यह है कि चर्चा अध्यात्म ज्ञान की चल रही है। योग का अर्थ भक्ति करना है। इस प्रकरण में युद्ध के लिए खड़ा होने को लिखना अनुवादकों की अल्पज्ञता का प्रमाण है। अगला अध्याय नं. 5 भी परमात्मा की भक्ति तथा शुभ-अशुभ तथा कर्तव्य-अकर्तव्य कर्मों का वर्णन करता है। गीता ज्ञान दाता से अन्य पूर्ण परमात्मा की जानकारी से भरा है।

गीता अध्याय दिव्य सारांश | Gita Adhyay