Shrimad Bhagavad Gita - Summary

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 5 - दिव्य सारांश् (1)

श्रीमद् भगवद् गीता - पांचवां अध्याय

दिव्य सारांश्

विश्लेषण:- गीता के इस अध्याय 5 में गीता ज्ञान कहने वाले ने अपने से अन्य परमेश्वर की विशेष जानकारी बताई है। श्लोक नं. 14-21, 24, 25, 26 में विशेष वर्णन है जो इस प्रकार है:-

गीता अध्याय 5 श्लोक 14 का अनुवाद:- गीता ज्ञान बोलने वाले ने अपने से अन्य कुल के मालिक की महिमा बताई है कि ‘‘प्रभु यानि कुल का स्वामी सर्व प्रथम विश्व का सृजन करता है। तब न तो किसी को कर्तापन का, न कर्मों का आधार होता है, न कर्मफल के संयोग ही आधार होते, परंतु सर्व प्राणी अपने स्वभाववश किए कर्म का फल ही बरत रहे होते हैं।

अध्याय 5 श्लोक 15 का अनुवाद:- सर्वव्यापक सर्व का स्वामी यानि पूर्ण परमात्मा न किसी का पाप और न किसी के शुभ कर्म का ही प्रतिफल देता है यानि निर्धारित किए नियम अनुसार जीव फल प्राप्त करता है, किंतु अज्ञान के द्वारा ज्ञान ढ़का हुआ है जिससे तत्वज्ञानहीनता के कारण जानवरों तुल्य सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं अर्थात् स्वभाववश शास्त्रा विधि रहित भक्ति कर्म करके क्षणिक सुखों में आसक्त हो रहे हैं। जो साधक शास्त्राविधि अनुसार भक्ति कर्म करते हैं। उनके पाप प्रभु क्षमा कर देता है, अन्यथा संस्कार ही बरतता है अर्थात् प्राप्त करता है।(5/15) इसी का विस्तृत विवरण श्लोक 16-17 में पढ़ें।

अध्याय 5 श्लोक 16 का अनुवाद:- परंतु जिनका वह अज्ञान पूर्ण परमात्मा के द्वारा संत रूप में प्रकट होकर आत्मज्ञान तथा परमात्म ज्ञान रूपी तत्वज्ञान बताया जाता है। जिसे तत्वदर्शी संत आगे प्रचार करते हैं, उस आत्मज्ञान द्वारा नष्ट हो गया है। उनका वह तत्वज्ञान (तत्परम्) गीता ज्ञान दाता से दूसरे उस पूर्ण परमात्मा को सूर्य की तरह प्रकाशित कर देता है यानि अज्ञान अंधेरा पूर्ण रूप से समाप्त करके परम अक्षर ब्रह्म की महिमा का ज्ञान करता है।

अध्याय 5 श्लोक 17 का अनुवाद:- उस तत्वज्ञान के आधार से भक्ति करके साधक पूर्ण परमात्मा को प्राप्त होता है और पुनरावर्ती यानि जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर पूर्ण मोक्ष प्राप्त करता है।

अध्याय 5 श्लोक 18 का अनुवाद:- तत्वज्ञानी साधक सब जीवों को समान दृष्टि से देखता है क्योंकि सबकी आत्मा एक जैसी है जो कर्मों अनुसार अन्य शरीरों को धारण किए है।(5/18)

अध्याय 5 श्लोक 19 का अनुवाद:- जिनका मन इस प्रकार स्थित है, वह संसार में रहते हुए भी निर्दोष होकर वे (ब्रह्मणि) सच्चिदानंद घन ब्रह्म में स्थित है।(5/19)

अध्याय 5 श्लोक 20 का अनुवाद:- जो तत्वज्ञान के आधार से सुख-दुःख को परमात्मा की रजा समझता है। वह (ब्रह्मवित्) परमात्मा के ज्ञान का जानने वाला साधक (ब्रह्मणि) सच्चिदानंद घन परमात्मा में स्थित है।(5/20)

अध्याय 5 श्लोक 24 का अनुवाद:- तत्वज्ञानी साधक अन्तरात्मा से पूर्ण परमात्मा से जुड़ा है, वह (योगी) साधक शांत ब्रह्म यानि परमशांति युक्त परमात्मा अर्थात् सच्चिदानंद घन परमात्मा को प्राप्त होता है।

अध्याय 5 श्लोक 25 का अनुवाद:- तत्वदर्शी संत से दीक्षा लेकर शास्त्राविधि अनुसार साधना करने से जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं। तत्वज्ञान से जिनके सब संशय निवृत हो गए हैं। वह सब प्राणियों का हितैषी होता है। वह सत्य भक्ति व शुभ कर्म करने वाला (ऋषयः) तत्वज्ञानी साधक (ब्रह्म निर्वाणम् लभन्ते) शांत ब्रह्म यानि सुखदायी शांत परमात्मा सतपुरूष को प्राप्त होते हैं। काल ब्रह्म तो उग्र प्रभु है। इसके लोक में कोई भी शांति से नहीं रह सकता। सबको कोई न कोई कष्ट बना ही रहता है। परंतु सत्यलोक में कोई कष्ट नहीं है। सर्व प्राणी शांति से रहते हैं। वह शांत परमात्मा है।

अध्याय 5 श्लोक 26 का अनुवाद:- विकार रहित व मन-जीते ज्ञानी आत्मा के लिए सब ओर पूर्ण परमात्मा ही विद्यमान में हैं यानि पूर्ण परमात्मा की सत्ता सर्व के ऊपर दिखती है। अध्याय 5 के श्लोक 1 में अर्जुन ने प्रश्न किया कि कर्म सन्यास और कर्मयोग में कौन सा श्रेष्ठ है?

कर्म सन्यास का विवरण

कर्म सन्यास दो प्रकार से होता है, 1. एक तो सन्यास वह होता है जिसमें साधक परमात्मा प्राप्ति के लिए प्रेरित होकर घर त्यागकर हठ करके जंगल में बैठ जाता है तथा शास्त्रा विधि रहित साधना करता है, दूसरा घर पर रहते हुए भी हठयोग करके घण्टों एक स्थान पर बैठ कर शास्त्रा विधि त्याग कर साधना करता है, ये दोनों ही कर्म सन्यासी हैं।

कर्मयोग का विवरण

यह भी दो प्रकार का होता है। एक तो बाल-बच्चों सहित सांसारिक कार्य करता हुआ शास्त्रा विधि अनुसार भक्ति साधना करता है या शादी न करवा करके घर पर या किसी आश्रम में रहता हुआ सांसारिक कर्म अर्थात् सेवा करता हुआ शास्त्रा विधि अनुसार साधना करता है, ये दोनों ही कर्मयोगी हैं।

दूसरी प्रकार के कर्मयोगी वे होते हैं जो बाल-बच्चों में रहते हैं तथा साधना शास्त्राविधि विरूद्ध करते हैं या शादी न करवाकर किसी आश्रम में सेवा करते हैं तथा साधना भी शास्त्राविधि के विपरित करते हैं। ये भी कर्म योगी ही कहलाते हैं।

गीता अध्याय दिव्य सारांश | Gita Adhyay