Shrimad Bhagavad Gita - Summary

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 5 - कर्म सन्यासी से कर्म योगी उत्तम हैं (2)

कर्म सन्यासी से कर्म योगी उत्तम हैं

गीता अध्याय 5 श्लोक 1 का अनुवाद:- हे (कृष्ण) कृष्ण! आप एक ओर (कर्मणाम्) कर्मों के (सन्यासम्) सन्यास की (च) और (पुनः) फिर कर्मों के (योगम्) कर्म करने की प्रशंसा कर रहे हैं। (एतयो) इन दोनों में से (यत्) जो (एकम्) एक मेरे लिए (श्रेयः) कल्याणकारक हो (तत्) वह (सुनिश्चितम्) भली-भांति निश्चित करके (ब्रूहि) कहिये।

केवल हिन्दी:- हे कृष्ण! आप एक ओर तो कर्मों के सन्यास की महिमामण्डन कर रहे हैं और फिर कर्मों के योग यानि कर्मों के संयोग की अर्थात् कर्म करने की प्रशंसा कर रहे हैं। इन दोनों में से जो एक मेरे लिए कल्याणकारक हो, उसको सुनिश्चित करके कहिए। (5/1)

अध्याय 5 श्लोक 2 का मूल पाठ:-

सन्यासः कर्मयोगः च निःश्रेयः अकरौ उभौ, तयो तू कर्मसन्यासात् कर्म योग विशिष्यते।(2)

अनुवाद तथा भावार्थ: गीता अध्याय 5 श्लोक 2 का भावार्थ है कि तत्वदर्शी सन्त के अभाव से जो शास्त्रा विरुद्ध साधक हैं वे दो प्रकार के हैं, एक तो कर्म सन्यासी, दूसरे कर्म योगी। दोनों की साधना अमंगलकारी तथा न करने वाली अर्थात् व्यर्थ हैं क्योंकि गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में कहा है कि शास्त्राविधि त्याग कर जो मनमाना आचरण अर्थात् पूजा करते हैं उनको लाभ नहीं होता श्लोक 24 में कहा है कि पूर्ण मोक्ष के लिए जो साधना त्यागने की है अर्थात् न करने वाली है तथा जो करने वाली है उनके लिए शास्त्रों को ही प्रमाण मानना। शास्त्रों का यर्थाथ ज्ञान तत्वदर्शी सन्त बताता है उसी से प्राप्त करके भक्ति करना लाभदायक है (प्रमाण गीता अध्याय 4 श्लोक 34, यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्रा 10 व 13)। फिर भी इन उपरोक्त शास्त्रा विरूद्ध दोनों साधकों में कर्मसन्यासी से कर्मयोगी अच्छा है, क्योंकि कर्मयोगी जो शास्त्रा विधि रहित साधना करता है, उसे जब कोई तत्वदर्शी संत का सतसंग प्राप्त हो जायेगा तो वह तुरन्त अपनी शास्त्रा विरुद्ध पूजा को त्याग कर शास्त्रा अनुकूल साधना पर लग कर आत्म कल्याण करवा लेता है। परन्तु कर्म सन्यासी दोनों ही प्रकार के हठ योगी घर पर रहते हुए भी, जो कान-आंखें बन्द करके एक स्थान पर बैठ कर हठयोग करने वाले तथा घर त्याग कर उपरोक्त हठ योग करने वाले तत्वदर्शी संत के ज्ञान को मानवश स्वीकार नहीं करते, क्योंकि उन्हें अपने त्याग तथा हठयोग से प्राप्त सिद्धियों का अभिमान हो जाता है तथा गृह त्याग का भी अभिमान सत्यभक्ति प्राप्ति में बाधक होता है। करोड़ों कर्म सन्यासियों में कोई-कोई ही सत्य भक्ति स्वीकार करता है। इसलिए शास्त्रा विरुद्ध कर्म सन्यासी साधक से शास्त्रा विरुद्ध कर्मयोगी साधक ही अच्छा है। इसी प्रकार सन्यास लेकर किसी आश्रम में रह कर शास्त्रा विधी अनुसार साधना लेकर आश्रम में रहने वाले कामचोर से तो कर्मयोगी अच्छा है क्योंकि सन्यास धारण करने वाले को अपने सन्यास का अभिमान हो जाता है।

गीता सार:- अध्याय 5 के श्लोक 2 में वर्णन है कि कर्म सन्यास (घर छोड़कर जाने वाले साधक) से कर्मयोग (घर पर बाल-बच्चों सहित रहते हुए या विवाह न करवा कर सांसारिक कार्य करता हुआ घर या आश्रम में रहने वाले साधक) श्रेष्ठ हैं। उदाहरण के लिए राजा अम्बरीष, राजा जनक, परम पूज्य कबीर साहिब जी (कविर्देव पूर्ण परमात्मा होते हुए भी लीला करके यही सिद्ध कर रहे हैं कि जैसे मैं अपना कर्म करता हुआ साधना कर रहा हूँ यही कर्मयोग श्रेष्ठ है), संत गरीबदास साहेब जी महाराज, श्री नानक देव जी, संत नामदेव जी, संत रविदास जी आदि-2 सन्त व परमेश्वर कबीर जी कर्मयोगी थे। साथ में यह भी कहा कि यदि साधना ठीक है तो चाहे घर रहो या बाहर आश्रम आदि में दोनों ही बराबर उपलब्धि प्राप्त करेंगे। यही प्रमाण गीता अध्याय 18 श्लोक 41 से 46 में कहा है कि चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्राी, वैश्य तथा शुद्र) के व्यक्ति भी अपने स्वभाविक कर्म करते हुए परम सिद्धी अर्थात् पूर्ण मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं। परम सिद्धि के विषय में स्पष्ट किया है अध्याय 18 श्लोक 46 में कि जिस परमात्मा परमेश्वर से सर्व प्राणियों की उत्पति हुई है जिस से यह समस्त संसार व्याप्त है, उस परमेश्वर कि अपने-2 स्वभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धी को प्राप्त हो जाता हैं अर्थात् कर्म करता हुआ सत्य साधक पूर्ण मोक्ष प्राप्त करता है। अध्याय 18 श्लोक 47 में स्पष्ट किया है कि शास्त्रा विरूद्ध साधना करने वाले (कर्म सन्यास) से अपना शास्त्रा विधी अनुसार (कर्म करते हुए) साधना करने वाला श्रेष्ठ है। क्योंकि अपने कर्म करता हुआ साधक पाप को प्राप्त नहीं होता। इससे यह भी सिद्ध हुआ कि कर्म सन्यास करके हठ करना पाप है। अध्याय 18 श्लोक 48 में स्पष्ट किया है कि अपने स्वाभाविक कर्मों को नहीं त्यागना चाहिए चाहे उसमें कुछ पाप भी नजर आता है। जैसे खेती करने में जीव मरते हैं आदि-2।

गरीब, डेरे डांडे खुश रहो, खुशरे लहे न मोक्ष। ध्रू प्रहलाद उधर गए, तो डेरे में क्या दोष।।
गरीब, केले की कोपीन है, फूल पान फल खाहीं। नर का मुख नहीं देखते, बस्ती निकट न जाहीं।।
गरीब, वो जंगल के रोज हैं, मनुष्यों बिदके जाहीं। निश दिन फिरैं उजाड़ में, साहिब पावे नाहीं।।

भावार्थ:- परमेश्वर कबीर जी से प्राप्त तत्वज्ञान में संत गरीबदास जी ने बताया है कि जो तत्वज्ञानहीन व्यक्ति कहते हैं कि आजीवन ब्रह्मचारी रहने वाला तथा सर्व भौतिक सुविधाओं को त्यागकर वन में निवास करने वाला ही मोक्ष प्राप्ति करता है। यह सब अज्ञानता है। तत्वदर्शी संत से ज्ञान व दीक्षा लेकर मर्यादा में रहकर साधना करने से मोक्ष होता है। उदाहरण दिया है कि डेरे डांडे यानि अपने घर पर खुशी के साथ रहो और सत्य साधना करो। यदि आजीवन ब्रह्मचारी रहने मात्रा से मोक्ष प्राप्त हो जाता है तो खुसरे (नपुसंक) का मोक्ष हुआ नहीं, देखा ना सुना। सत्य साधना चाहे गृहस्थ करो, चाहे ब्रह्मचारी, चाहे खुसरे करो, सबका मोक्ष हो जाता है। जैसे कहते हैं कि धु्रव तथा प्रहलाद का मोक्ष हुआ है तो वे दोनों ही विवाहित थे, राजा रहे। फिर गृहस्थी में क्या दोष है? अर्थात् गृहस्थी भी मोक्ष प्राप्त करते हैं।

जो कर्म सन्यासी घर त्यागकर जंगल में चले जाते हैं तथा निःवस्त्रा होकर केवल केले के पत्ते की कोपीन (लंगोट) बना कर फल-फूल व पत्तों का आहार करते हैं, नगर में नहीं जाते हैं, मनुष्यों के दर्शन भी नहीं करते हैं, जंगल में गुफा बनाकर या झाड़-बोझड़ों में अपना सारा जीवन बिताते हैं, यदि उनकी साधना शास्त्रा विधि अनुसार नहीं है तो वे परमात्मा प्राप्ति नहीं कर सकते। क्योंकि वे तो जंगली जानवर रोज के समान हैं। जंगल में गर्मी-सर्दी, भूख-प्यास से परेशानी तथा दुःख व जंगली हिंसक जानवरों का भय बना रहता है। भक्ति तो तब हो सकती है जब गर्मी-सर्दी, भूख-प्यास का समय पर समाधान हो जाए। यह सुविधा जंगल में कर्म सन्यासी को प्राप्त नहीं हो सकती। फिर उन्हें अपने त्याग का अभिमान हो जाता है उस कारण वह भक्ति हीन हो जाता है। 

कबीर, मन के मारे बन गए, बन तज बस्ती मांह। कहैं कबीर मैं क्या करूँ, मन तो मानै नांह।।

भावार्थ:- पूर्व जन्म के भक्ति संस्कारों से प्रेरित साधक वन में जाकर किसी अज्ञानी गुरू को पूर्ण गुरू मानकर दीक्षा लेकर घोर तप साधना करता है। उससे अपनी भक्ति सफल मानकर संतुष्ट हो जाता है। कुछ समय पश्चात् जब परमात्मा परीक्षा लेता है तो तत्वज्ञान के अभाव से असफलता हाथ लगती है। पुनः विवाह करके घर लौट आता है। उदाहरण के लिए श्रंगी ऋषि की कथा:-

श्रंगी ऋषि जैसे कर्मसन्यासी भी असफल रहे

एक समय श्रंगी ऋषि कर्म सन्यासी बन कर वर्षों तक जंगल में चले गए। फिर कुछ समय जंगल में भूख-प्यास, गर्मी-सर्दी सहन करने की क्षमता प्राप्त करने के लिए कठिन हठयोग अभ्यास किया। निराहार प्राण-अपान वायु को वश करके समाधिस्थ हो जाना जिससे शरीर को गर्मी-सर्दी कम लगती है। जैसे ‘ओ3म‘ मन्त्रा (जो वेदों व गीता में ब्रह्म उपासना का सही नाम है) के जाप को करते हुए समाधी प्राप्त करना, शास्त्रा विधि रहित मनमाना आचरण करने वालों का ध्यान यज्ञ कहलाता है। यज्ञ का प्रतिफल स्वर्ग या राज प्राप्ति तथा फिर चैरासी लाख योनियों में कष्ठ उठाना। क्योंकि ध्यान यज्ञ करने के लिए बैठा रहना होता है। फिर वह बैठना तप बन जाता है।

ओ3म मन्त्र से उपलब्धि:--सिद्धियाँ व स्वर्ग प्राप्ति।

गरीब, ओंकार ईश्वरी माया, जिन ब्रह्मा विष्णु महेश भ्रमाया।
गरीब, ओ3म आनंदी लहर है रंग होरी हो। सोहं मुक्ता सिंध राम रंग होरी हो।

तप से राज प्राप्ति। फिर दोनों को भोगकर नरक व चैरासी लाख योनियों में कष्ट सदा बना रहता है। क्योंकि प्राणायाम द्वारा श्वांस छोटा करके ध्यान (meditation) से समाधी लगती है। उसमें श्वांस रोकने से वायु के कीटाणु जो श्वांस रूकने से मर जाते हैं उनका पाप अभ्यासी को भोगना पड़ता है। क्योंकि तीन लोक व ब्रह्म तक की साधना में जैसे कर्म प्राणी करता है सर्व भोग्य होते हैं। पुण्य स्वर्ग में और पाप नरक व चैरासी लाख जूनियों में भोगना पड़ता है। इसके विपरीत प्रभु के द्वारा दिए भक्ति साधन के मत (सिद्धान्त) के विरुद्ध साधना करने से दोष लगता है, प्रभु की आज्ञा की अवहेलना करने के कारण वह पाप और भयंकर होता है। श्रंगी ऋषि जी ने श्वांस रोक कर तथा अल्प आहार करने का अभ्यास कर लिया। वे वृक्ष की ओर मुख करके साधना करते तथा सारा दिन में एक बार वृक्ष की छाल पर जिह्ना से चाटते थे। बस यह आहार था। फिर कुछ वर्षों के बाद अयोध्या के बाहर नजदीक ही जंगल में आकर बैठ गए तथा अपनी साधना का प्रदर्शन करने लगे। अयोध्या वासियों के लिए एक विशेष चर्चा तथा आकर्षण का कारण बन गए।  

एक दिन राजा दशरथ की लड़की शांता भी अपने पिता से आज्ञा लेकर ऋषि के दर्शनार्थ गई। वह श्रंगी ऋषि के स्वरूप को देख कर आसक्त हो गई। फिर उसको उठाने का प्रयत्न करने लगी। किसी ने बताया कि जहाँ यह जिह्ना से छाल को चाटता है वहां कुछ शहद लगा दो तथा साथ में खाना ले जाना। जब यह आँखें खोले तो इसे खाना खिलाना। फिर यह ज्यादा समाधिस्थ नहीं हो पाएगा। ऐसा ही किया। ऋषि जी ने शहद के लगने से आनन्द आया तथा कई बार छाल को चाटा। दूसरे दिन आँखें खोली तथा खीर खाई। राजा दशरथ श्रंगी ऋषि को पहुँचा हुआ योगी मान कर घर ले गया तथा गुरु बनाया। पुत्रा प्राप्ति के लिए प्रार्थना की, तब श्रंगी ऋषि ने एक पुत्रोष्टि यज्ञ करवाने की सलाह दी। दिन निश्चित हुआ। उसी दौरान श्रंगी ऋषि से शांता का प्रेम सम्बन्ध हो गया। परंतु राजा दशरथ ने मना कर दिया कि हम क्षत्राी हैं, यह ब्राह्मण है, इसलिए विवाह असंभव है। एक ऋषि ने लड़की को गोद लिया। फिर उनका विवाह कर दिया। ऋषि अपनी पत्नी को लेकर दूर जंगल में चला गया। वहाँ कुटी बनाकर रहने लगा। इसका प्रमाण श्री तुलसीदास कृत रामायण के बाल काण्ड ‘रामकलेवा‘ में (पृष्ठ नं. 274) में निम्न साखियों में है।

बोली सिद्धि सुनहु रघुनन्दन तुम हमार नन्दोई। एक बात तुम सौ हम पूछें लला न राखहु गोई।।
होत ब्याह सम्बन्ध सबन कौं अपनी ही जातिहि माही। निज बहिनी श्रृंगी ऋषि को तुम कैसे दियौ विवाही।।
की उनको मुनीश लै भाग्यौ की बौई संग लागी। ऐसी बात बतावहु लालन तुम रघुवंश अदागी।।

यहां पर आदरणीय गरीबदास साहेब जी महाराज कहते हैं पूर्ण परमात्मा की सही साधना न मिलने से यह प्राणी समझ लेता है मैं ठीक कर रहा हूँ। परंतु प्रतिफल गलत होता है।

गरीब, डींभ करै डूंगर चढें, अंतर झीनी झूल। जग जाने बंदगी करे, बोवै शूल बबूल।।1
गरीब, जैसे चंदन शर्प लिपटाई। शीतल तन भया विष नहीं जाई।।2

भावार्थ:- पाखण्ड (डींभ) करके (डूंगर) ऊँचे स्थान पर चढ़कर घोर तप करके प्रदर्शन करने वालों के अंदर विकार प्रभावित रहते हैं। जैसा कि गीता अध्याय 3 श्लोक 6 में भी प्रमाण है जो मूढ़ बुद्धि आत्मा समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से इन्द्रियों का चिंतन करता रहता है, वह मिथ्याचारी यानि दम्भी (पाखंडी) कहा जाता है। ऊपर वाणी में भी कहा है कि जनता को दिखाने के लिए पाखण्ड करके ऊँचे स्थान पर हठ करने का ढ़ोंग करता है। अंदर सर्व विकार मचल रहे हैं। भोली जनता समझ रही है कि बहुत बड़ा भक्त है कितनी कठिन साधना कर रहा है, परंतु वह शास्त्राविधि त्यागकर मनकल्पित घोर तप करके अपने भविष्य में काँटे बीज रहा है क्योंकि गीता अध्याय 17 श्लोक 5-6 में इस प्रकार के तप को करने वाले असुर स्वभाव के कहा है।

सतनाम व सारनाम की भक्ति (कमाई) बिना अन्य साधना पूज्य परमेश्वर कविर्देव (कबीर प्रभु) के बताए अनुसार आदरणीय गरीबदास साहेब जी ने ऐसी बताई जैसे सर्प गर्मियों में चन्दन के वृक्ष से चिपक जाते हैं। उन्हें महसूस होता है कि हमें शांति मिल रही है परन्तु उनका विष कम नहीं हो रहा है जिसके कारण उन्हें गर्मी तथा बेचैनी-भय बना रहता है।

इसी प्रकार साधक चाहे ब्रह्म (काल) उपासना कितनी ही करें उनके विकार (काम, क्रोध, मोह, लोभ, अंहकार) कम नहीं होते जो उनके दुःख का कारण है। इसलिए कर्म सन्यासी से कर्मयोगी उत्तम है।

गीता अध्याय दिव्य सारांश | Gita Adhyay