Shrimad Bhagavad Gita - Summary

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 5 - कर्म सन्यासी को त्याग का अभिमान हो जाता है (4)

कर्म सन्यासी को त्याग का अभिमान हो जाता है

गीता जी अध्याय 5 श्लोक 7 में स्पष्ट किया है कि उपरोक्त दोनों प्रकार के सन्यासियों (कर्मसन्यास वाले) को अपने त्याग व साधना का अभिमान हुए बिना नहीं रहता। अभिमान भगवान के मार्ग में पूरा बाधक है अर्थात् अभिमानी व्यक्ति की सर्व साधना पूजा निष्फल हो जाती है, परमात्मा प्राप्ति नहीं होती। गीता जी के अध्याय 5 के श्लोक 2 में कहा है कि कर्मसन्यास से
कर्मयोग श्रेष्ठ है।

प्रमाण: धु्रव, प्रहलाद, राजा अम्बरीष, राजा जनक शास्त्रा विधि रहित गृहस्थी कर्मयोगी थे, श्री नानक जी, संत रविदास, संत गरीबदास साहेब जी शास्त्रा अनुकूल साधना करने वाले गृहस्थी (कर्मयोगी) थे, कर्मयोगी में अभिमान नहीं हो पाता है। वह अपने अशुभ से डरता रहता है और संतों का आदर करता है।

 

गीता अध्याय दिव्य सारांश | Gita Adhyay