32 गीता अध्याय 4 श्लोक 6 में गीता ज्ञान दाता ने अपने आप को अविनाशी ईश्वर अजन्मा कहा है।

प्रश्न:- गीता अध्याय 4 श्लोक 6 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि मैं अजन्मा और अविनाशी रुप होते हुए भी समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी योग माया से प्रकट होता हूँ। इस में श्री कृष्ण जी अपने आप को समस्त प्राणियों का अविनाशी ईश्वर कह रहे हैं, अपने को अजन्मा भी कहा है।

उत्तर :- ज्ञान दाता ने कहा है कि जितने प्राणी मेरे 21 ब्रह्माण्डों में मेरे अन्तर्गत हैं। मैं उनका श्रेष्ठ प्रभु (ईश्वर) हूँ। यही प्रमाण गीता अध्याय 8 श्लोक 18 में भी है कि गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि मैं लोक वेद (सुनी-सुनाई बातें) के आधार से अपने 21 ब्रह्माण्डों वाले लोक में पुरुषोत्तम प्रसिद्ध हूँ क्योंकि मैं शरीरधारी प्राणियों से तथा अविनाशी जीवात्मा से भी श्रेष्ठ हूँ जो मेरे अन्तर्गत आते हैं। वास्तव में पुरुषोत्तम तो कोई अन्य ही है जिसका वर्णन गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में बताया गया है।

गीता के अध्याय 4 श्लोक 6 में यह कहा है कि मैं (अजः) अजन्मा अर्थात् मैं तुम्हारी तरह जन्म नहीं लेता, मैं लीला से प्रकट होता हूँ। जैसे गीता अध्याय 10 में विराट रुप दिखाया था, फिर कहा है कि (अव्ययात्मा) मेरी आत्मा अमर है। फिर कहा है कि (आत्ममायया) अपनी लीला से (सम्भवामि) उत्पन्न होता हूँ।

यहाँ पर उत्पन्न होने की बात है क्योंकि यह काल ब्रह्म अक्षर पुरुष के एक युग के उपरान्त मरता है। फिर उस समय एक ब्रह्माण्ड का विनाश हो जाता है (देखें प्रश्न 9 का उत्तर) फिर दूसरे ब्रह्माण्ड में सर्व जीवात्माएं चली जाती हैं। काल ब्रह्म की आत्मा भी चली जाती है। वहाँ इसको पुनः युवा शरीर प्राप्त होता है। इसी प्रकार देवी दुर्गा की मृत्यु होती है। फिर काल ब्रह्म के साथ ही इसको भी युवा शरीर प्राप्त होता है। यह परम अक्षर ब्रह्म का विधान है। तो फिर उस नए ब्रह्माण्ड में दोनों पति-पत्नी रुप में नए रजगुण युक्त ब्रह्मा, सतगुण युक्त विष्णु तथा तमगुण युक्त शिव को उत्पन्न करते हैं। फिर उस ब्रह्माण्ड में सृष्टि क्रम प्रारम्भ होता है। इस प्रकार इस काल ब्रह्म की मृत्यु तथा लीला से जन्म होता है। वास्तव में यह नाशवान है। आत्मा सर्व प्राणियों की भी अमर है। आप के महामण्डलेश्वरों आचार्यों तथा शंकराचार्यों को अध्यात्मिक ज्ञान बिल्कुल नहीं है। इसलिए अनमोल ग्रन्थों को ठीक से न समझकर लोकवेद (दन्तकथा) सुनाते हैं। आप देखें इस गीता अध्याय 4 श्लोक 5 में स्वयं कह रहा है कि हे अर्जुन! तेरे और मेरे बहुत जन्म हो चुके हैं। उन सबको मैं जानता हूँ, तू नहीं जानता। इसका अभिप्राय ऊपर स्पष्ट कर दिया है। सम्भवात् का अर्थ उत्पन्न होना है। यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्र 10 में भी कहा है कि कोई तो परमात्मा को (सम्भवात्) जन्म लेने वाला राम व कृष्ण की तरह मानता है, कोई (असम्भवात्) उत्पन्न न होने वाला निराकार मानता है अर्थात् तत्वदर्शी सन्त जो सत्यज्ञान बताते हैं, उनसे सुनो। वे बताएंगे कि परमात्मा उत्पन्न होता है या नहीं। वास्तव में परमात्मा स्वयंभू है। वह कभी नहीं जन्मा है और न जन्मेगा। मृत्यु का तो प्रश्न ही नहीं। दूसरी ओर गीता ज्ञान दाता स्वयं कह रहा है कि मैं जन्मता और मरता हूँ, अविनाशी नहीं हूँ। अविनाशी तो ‘‘परम अक्षर ब्रह्म’’ है।

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