अध्याय 17

Bhagavad Gita अध्याय 17

{विशेष:- गीता अध्याय 17 में प्रवेश से पहले यह व्याख्या ध्यानपूर्वक पढ़ें व समझें। गीता अध्याय 16 के श्लोक 1 से 5 में अच्छे स्वभाव वाले दैवी प्रकृति वाले व्यक्तियों का वर्णन है, परंतु वे भी शास्त्रविरूद्ध साधना करते हैं। श्लोक 6.9ए 14.20 में कहा है कि जो कहते हैं कि संसार का कोई ईश्वर या परमेश्वर कर्ता नहीं है। यह तो नर-मादा के संयोग से उत्पन्न होता है। काम (sex) इसका कारण है। वे शास्त्रविधि त्यागकर मनमाना आचरण करके अपना जीवन नष्ट करते हैं तथा मानव शरीर में बने कमल चक्रों में विराजमान मुख्य देवताओं, मुझे तथा परमेश्वर को क्रश करने वाले हैं। उन कुकर्मियों को बार-बार असुर योनि में डालता हूँ। फिर इस अध्याय 16 के श्लोक 23 - 24 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि:-

अध्याय 16 श्लोक 23 का अनुवाद:- जो साधक शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है यानि शास्त्र वर्णित साधना मंत्रों के अतिरिक्त अन्य नाम जाप करता है। अन्य साधना शास्त्रविरूद्ध करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है यानि सत्य साधना से होने वाली भक्ति की शक्ति जिसके बल से साधक सनातन परम धाम जाता है, वह सिद्धि उसे प्राप्त नहीं होती, न उसे कोई सुख प्राप्त होता है, न उसकी गति यानि मुक्ति होती है अर्थात् शास्त्र के विपरित भक्ति करना व्यर्थ है क्योंकि इन तीनों लाभों को प्राप्त करने के लिए साधक परमात्मा की भक्ति करता है।

गीता अध्याय 16 श्लोक 24 का अनुवाद:- इससे तेरे लिए कर्तव्य यानि जो साधना कर्म करने योग्य हैं और अकर्तव्य अर्थात् जो न करने वाला भक्ति कर्म है, उसके निर्णय के लिए शास्त्र ही प्रमाण मानना है। इस अध्याय 17 में उन्हीं के विषय में अर्जुन ने प्रश्न किया है कि ये जो शास्त्रविधि त्यागकर साधना करते हैं। उनकी साधना है तो व्यर्थ, परंतु उनकी श्रद्धा कितने प्रकार की व कैसी होती है?}

गीता अध्याय 17 के श्लोक 1 में अर्जुन ने प्रश्न किया कि शास्त्रविधि को त्यागकर यानि शास्त्र के विपरित मनमाना आचरण करके श्रद्धा से युक्त हुए साधना (पूजन) करने वाले व्यक्ति किस निष्ठा (वृत्ति) के होते है? सात्विक या राजसी वा तामसी अर्थात् तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिवजी) तथा इनसे भी नीचे के देवी-देवताओं के साधकों के स्वभाव तथा चरित्र कैसे होते हैं?

।। सर्व प्राणी शास्त्र विधि रहित भक्ति भी स्वभाव अनुसार ही करते हैं।।

गीता ज्ञान दाता का उत्तर:-

(गीता अध्याय 17 श्लोक 2 से 10 तक का सारांश)

गीता ज्ञान दाता ने उत्तर दिया है कि शास्त्रविधि को त्यागकर साधना करने वाले वाले स्वभाव वश साधना करते हैं। जिसका अंतःकरण जैसा है, उसे वैसी पूजाओं में श्रद्धा होती है। 

  • सात्विक वृत्ति के व्यक्ति अन्य देवी-देवताओं तथा श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, श्री शिव जी को पूजते हैं तथा विशेष कर इष्ट रूप में विष्णु जी की पूजा करते हैं जो शास्त्रविरूद्ध है।
  • राजस वृत्ति के व्यक्ति यक्षों व राक्षसों की व तीनों उपरोक्त प्रभुओं को भी पूजते हैं, परन्तु इष्ट रूप में ब्रह्मा जी की उपासना रजोगुण प्रधान व्यक्ति करते हैं जो शास्त्रविरूद्ध है।
  • तामस वृत्ति के भूतों, पित्रों तथा तीनों ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, श्री शिव जी की भी पूजा करते हंै तथा तमोगुण प्रधान व्यक्तियों का उपास्य देव शिव होता है। जैसे रावण ने भगवान शिव की साधना इष्ट मान कर की जिस से नरक का भागी हुआ और उससे निम्न स्तर की साधना भूतों-पितरों की पूजा करके सीधे नरक चले जाते हैं। जो शास्त्र विधि के विरूद्ध साधना करते हैं वे दुष्ट आत्मा मुझे तथा उस परमात्मा को भी कष्ट देते हैं तथा वे राक्षस वृत्ति के जान। उनको भोजन भी वृत्ति (स्वभाव) वश ही पसंद होता है। सात्विक मनुष्यों को साधारण भोजन दाल, दूध, दही-घी, मक्खन, शहद, मीठे फल आदि पसंद तथा राजसी मनुष्य कड़वे (शराब, पान, हुक्का) खट्टे, ज्यादा नमक वाले, ज्यादा गर्म-रूखे, मुख जलाने वाले (मिर्च) आदि जो रोगों का कारण होते हैं पसंद होता है।

तामसी व्यक्ति गला-सड़ा, रस रहित अपवित्र (मांस-शराब-तम्बाखु आदि) बासी, झूठा आहार पसंद करते हैं।

।। शास्त्र विधि को त्याग कर साधना करने वाले भगवानों के लिए दुःखदाई तथा नरक के अधिकारी।।

अध्याय 17 के श्लोक 6 का अनुवाद:-- शरीर में स्थित मुझे तथा प्राणियों के मुखिया (ब्रह्मा, विष्णु, शिव, प्रकृति-आदि माया व गणेश) तथा शरीर में हृदय में स्थित कपड़े में धागे की तरह व्यवस्थित करके रहने वाले पूर्ण परमात्मा को परेशान (कृश) करने वाले अज्ञानियों को राक्षसी स्वभाव वाले ही जान जो मतानुसार (शास्त्र विधि अनुसार) साधना नहीं करते और मनमुखी साधना तथा आचरण करते हैं।

विशेष: मानव शरीर (स्थूल शरीर) में कुल कमल चक्र नौ हैं, परंतु सात कमल हैं जो सामान्य ऋषि की पहुँच में हैं। यहाँ पर सात कमल चक्रों का वर्णन किया जाता है।

प्रत्येक चक्र में भिन्न-भिन्न देवताओं का प्रभाव है। जैसे टैलिविजन चैनल (ज्ण्टण् ब्ींददमस) से प्रसारण तो एक स्थान यानि प्रसारण केन्द्र से होता है, वही करोड़ों टैलिविजनों में देखा जाता है। इसी प्रकार प्रत्येक देवता अन्य स्थानों पर रहते हुए भी मानव शरीर में बने कमल चक्रों में दिखाई देते हैं।

रीढ़ की हड्डी गुदा के पास समाप्त होती है। उससे दो ऊँगल ऊपर -

  1. मूल कमल - इसमें गणेश जी रहते हैं। इस कमल की चार पंखुड़ियाँ हैं। फिर मूल कमल से लगभग दो ऊँगल ऊपर रीड की हड्डी के साथ अन्दर की तरफ 
  2. स्वाद कमल (चक्र) है जिसमें ब्रह्मा सावित्राी रहते हैं। इस कमल की छः पंखुड़ियाँ हैं।
  3. स्वाद चक्र से ऊपर नाभि के सामने रीड की हड्डी के साथ नाभि कमल है उसमें भगवान विष्णु व लक्ष्मी रहते हैं। इनकी आठ पंखुड़ियाँ हैं।
  4. इससे ऊपर हृदय के पीछे एक हृदय कमल है उसमें भगवान शिव व पार्वती रहते हैं। इस हृदय कमल की 12 पंखुड़ियाँ हैं।
  5. इनसे ऊपर कण्ठ कमल है जो कण्ठ के पास पीछे रीढ की हड्डी से ही चिपका हुआ है। इसमें प्रकृति देवी (अष्टंगी माई) रहती है। इस कमल की सोलह पंखुड़ियाँ हैं।
  6. इससे ऊपर त्रिकुटी कमल है। इसकी दो पंखुड़ियाँ हैं। (एक सफेद दूसरी काली रंग की।) इसमें पूर्ण परमात्मा रहता है। जैसे सूर्य दूर स्थान पर होते हुए भी प्रत्येक मानव के शरीर पर प्रभाव डालता रहता है, परन्तु दिखाई आँखों से ही देता है, यहाँ पर ऐसा भाव जानना है तथा इसके साथ-साथ आत्मा के साथ अन्तःकरण में भी रहता है। जैसे धागा पूरे कपड़े में समाया हुआ होता है तथा अन्य कशीदाकारी भी होती है जो कुछ हिस्से पर ही होती है।
  7. इससे ऊपर जहाँ चोटी रखते हैं उस स्थान पर अन्दर की ओर सहंस्रार कमल है जहाँ ज्योति निंरजन (हजार पंखुड़ियों रूप में प्रकाश रूप में) स्वयं काल (ब्रह्म) रहता है। इस कमल की एक हजार पंखुड़ियाँ हैं। इसीलिए इस श्लोक में कहा है कि जो राक्षस स्वभाव के व्यक्ति शास्त्रानुकूल साधना नहीं करते वे शरीर में रहने वाले मुझे तथा प्राणी प्रमुख ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गणेश, आद्या (प्रकृति) तथा पूर्ण परमात्मा जो आत्मा के साथ अभेद रूप से रहता है (जैसे गंध और वायु रहती हैं) को परेशान करते हैं, उन्हें घोर नरक में डालता हूँ।

भक्त सम्मन को अपने गुरुदेव जी के लिए अपने इकलौते पुत्र सेऊ की गर्दन काटनी पड़ी तो भी पीछे नहीं हटा। यह शास्त्रानुकूल साधक का शरीर सम्बन्धी तप हुआ। जैसे कबीर साहेब सत्य साधना का विवरण दिया करते थे। झूठी साधना (देवी-देवताओं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, माता मसानी, मूर्ति पूजा) को अधूरी तथा मोक्ष बाधक बताते थे। शराब पीना, मांस खाना, तम्बाखु प्रयोग करना महा पाप है। हिन्दु-मुस्लिम एक ही परमात्मा के जीव हैं। मस्जिद व मन्दिर में भगवान नहीं है। भगवान तो पूर्ण संत से नाम लेकर शास्त्रानुकूल साधना करने से शरीर में ही प्राप्त होता है। जैसे गाय, भैंस, भेड़, बकरी, या कोई भी स्तन धारी मादा प्राणी है। उसके शरीर में से ही दूध प्राप्त होता है। बिना बच्चे वाली मादा के शरीर में दूध नहीं होता परंतु जब वह मादा नए दूध होती है अर्थात् गर्भधारण करती है। फिर बच्चे को जन्म देती है। तब दूध प्राप्त होता है। इसी प्रकार जब यह मनुष्य शरीर धारी प्राणी पूर्ण गुरु (तत्वदर्शी संत) से नाम ले लेता है। फिर सुमरण करता है तथा आजीवन गुरु मर्यादा में रहता है तो उसमें भक्ति रूपी बच्चा तैयार होता है। फिर परमात्मा से मिलने वाला लाभ (दूध) प्राप्त होता है। अन्य कहीं पर परमात्मा प्राप्ति नहीं है। वैसे तो परमात्मा की शक्ति निराकार रूप में सर्व व्यापक है। जैसे सूर्य का प्रकाश व ताप दिन के समय सर्व स्थानों पर प्रभाव डालता है, परंतु ऊर्जा संग्रह तो सौलर यन्त्र ही करता है यानि मानव शरीर में भक्ति से परमात्मा की शक्ति संग्रह होती है जो लाभ देती है। कार्य सिद्ध करती है, मोक्ष देती है। ऐसे ही प्रभु आकार में सत्यलोक में रहते हुए भी घर, खेत, मन्दिर, मस्जिद आदि में भी है। परंतु वह जीव को कोई लाभ नहीं दे रहा है। लाभ गुरू से नाम प्राप्त व्यक्ति को ही मिलता है।

अन्य उदाहरण:- जैसे सूर्य का प्रकाश व ताप अपने विधान के अनुसार ही लाभ प्रदान करता है। सर्दियों में पूर्ण ताप प्रदान नहीं कर पाता जिस की पूर्ति के लिए आग जलानी पड़ती है या हीटर-वातानुकूल करने वाले (air conditioner) यन्त्र का प्रयोग अवश्य करना पड़ता है या मोटे व ऊनी वस्त्र धारण करके ताप पूर्ति की जाती है। इसी प्रकार हम सत्यलोक में उस पूर्ण परमात्मा का पूर्ण लाभ प्राप्त कर रहे थे। अब हम उस परमेश्वर से दूर आने से सर्दियों वाले शरद क्षेत्र में आ गए हैं। उसके कुछ गुण प्राप्त करने के लिए वही साधन अपनाने पड़ेंगे जो हमारी रक्षा कर सकें अर्थात् शास्त्र विधि (उपरोक्त गर्मी पैदा करने वाले वास्तविक साधनों को) त्याग कर अन्य उपाय (शास्त्र विधि रहित) करने का कोई लाभ नहीं है। (प्रमाण पवित्र गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में)।

जब दुःखी प्राणी संत (परमात्मा प्रकट किए हुए साधक) के पास जाता है। उसके आशीर्वाद से सुखी हो जाता है। वहाँ परमात्मा उस संत में मिला अर्थात् उस पूर्ण संत ने ताप प्रदान करनेवाले साधन (शास्त्र विधि अनुसार साधना) प्रदान किए जिससे उसको ईश्वरीय गुणों का लाभ प्राप्तहुआ। क्योंकि परमात्मा के यही गुण होते हैं। किसी धर्म के अन्दर मांस, मदिरा, तम्बाखु सेवन काआदेश नहीं है अर्थात् सख्त मनाही है। जो बकरी काट कर भगवान पूजन करते हैं वे भक्ति नहीं कररहे बल्कि नरक के अधिकारी बन रहे हैं। इन सच्ची बातों का बुरा मान कर धर्म के झूठे ठेकेदारों कथित मुल्ला, काजी व कथित पंडितों ने कबीर साहेब को बहुत तंग किया। कभी सरसों के उबलते हुए तेल में डाला। कभी खूनी हाथी के आगे डाला आदि-आदि। यह वाणी सम्बन्धी तप कहा जाता है।