Chapter 8 Verse 4

Adhibhootam, ksharH, bhaavH, purushH, ch, adhidaivtam,
AdhiyagyaH, aham, ev, atr, dehe, dehbhrtaam, var ||4||

Translation: (Atr) this (dehbhrtaam var) superior among embodied beings i.e. human (dehe) in body (ksharH, bhaavH) with perishable nature (Adhibhootam) master of the Adhibhoot living being/soul (ch) and (Adhidaivtam) master of the Adhidaiv divine power (AdhiyagyaH) master of the yagya i.e. Adhiyagya situated in the yagyas (PurushH) is the Supreme/Complete God (ev) similarly, in this human body (Aham) I am. (4)

Translation

Superior among embodied beings i.e. in this human body, Adhibhoot - Lord of the living being with perishable nature, and Adhidaiv – lord of divine power, and Adhiyagya – lord of yagya i.e. situated in the yagyas, is the Complete/Supreme God. Similarly, I am in this human body.

Meaning

Amongst all the embodied beings, the superior body is human body. All the gods reside in this human body. Like, in Gita Adhyay 15 Shlok 15, God, the giver of the knowledge of Gita, is saying that I am situated in the heart of all the living beings. In Gita Adhyay 13 Shlok 17, it is said that, that Purna Brahm, the light of lights, is said to be much farther from Maya. He is worthy of being known through Tatvgyan, and is situated in everyone’s heart in a special way. Likewise, in Gita Adhyay 18 Shlok 61, it is said that the Antaryami (all-knowing) Supreme God by making one revolve through His Maya in the body-like machine, is situated in the heart of (sarvbhootanaam) all the living beings. {It has been proved from this that both the Gods (Brahm and Purna Brahm) reside in the body.}

Note: It is clear in Gita Adhyay 3 Shlok 14, 15 that the Omnipresent God, Purna Brahm, only is situated in the yagyas i.e. is Adhiyagya.


अधिभूतम्, क्षरः, भावः, पुरुषः, च, अधिदैवतम्,
अधियज्ञः, अहम्, एव, अत्रा, देहे, देहभृताम्, वर।।4।।

अनुवाद: (अत्रा) इस (देहभृताम् वर) देह धारियों में श्रेष्ठ अर्थात् मानव (देहे) शरीर में (क्षरः भावः) नाश्वान स्वभाव वाले (अधिभूतम्) अधिभूत जीव का स्वामी (च) और (अधिदैवतम्) अधिदैव दैवी शक्ति का स्वामी (अधियज्ञः) यज्ञ का स्वामी अर्थात् यज्ञ में प्रतिष्ठित अधियज्ञ (पुरूषः) पूर्ण परमात्मा है(एव) इसी प्रकार इस मानव शरीर में (अहम्) मैं हूँ। (4)

केवल हिन्दी अनुवाद: इस देह धारियों में श्रेष्ठ अर्थात् मानव शरीर में नाश्वान स्वभाव वाले अधिभूत जीव का स्वामी और अधिदैव दैवी शक्ति का स्वामी यज्ञ का स्वामी अर्थात् यज्ञ में प्रतिष्ठित अधियज्ञ पूर्ण परमात्मा है इसी प्रकार इस मानव शरीर में मैं हूँ। (4)

भावार्थ:- सर्व देहधारी प्राणियों में श्रेष्ठ शरीर मानव शरीर है। इस मानव शरीर में सर्व प्रभुओं का वास है। जैसे गीता अध्याय 15 श्लोक 15 में गीता ज्ञान दाता प्रभु कह रहा है कि मैं सर्व प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। गीता अध्याय 13 श्लोक 17 में कहा है कि वह पूर्ण ब्रह्म ज्योतियों का ज्योति माया से अति परे कहा जाता है। वह तत्वज्ञान से जानने योग्य है और सब के हृदय में विशेष रूप से स्थित है। इसी प्रकार गीता अध्याय 18 श्लोक 61 में कहा है शरीर रूपी यन्त्रा में अन्र्तयामी परमेश्वर अपनी माया से भ्रमण कराता हुआ (सर्वभूतानाम्) सर्व प्राणियों के हृदय में स्थित है। {इससे सिद्ध हुआ कि शरीर में दोनों प्रभुओं (ब्रह्म तथा पूर्ण ब्रह्म) का वास है}

नोट:- गीता अ. 3 के श्लोक 14,15 में स्पष्ट है कि सर्वव्यापक परमात्मा पूर्णब्रह्म ही यज्ञों में प्रतिष्ठित है अर्थात् अधियज्ञ है।

Sat Bhakti Sandesh