Chapter 15 Verse 1

Oordhvmoolam’, adhHshaakham’, ashvttham’, praahuH, avyyam’,
Chhandaasi, yasya, parnaani, yaH, tam’, ved, saH, vedvit’ ||1||

Translation: (Oordhvmoolam’) with the roots above in the form of Purna Parmatma Aadi Purush Parmeshwar (adhHshaakham’) the branches below in the form of the three gunas i.e. Rajgun-Brahma, Satgun-Vishnu and Tamgun-Shiv (avyyam’) imperishable (ashvttham’) is extensive Pipal tree (yasya) whose (chhandaasi) just as there are verses in Vedas similarly the world-like tree also has divisions, small-small parts or twigs and (parnaani) leaves (praahuH) are said to be (tam’) that tree of world (yaH) who (ved) knows in detail (saH) he (vedvit’) is completely knowledgeable i.e. is Tatvdarshi. (1)

Translation

With the roots above in the form of Purna Parmatma Aadi Purush Parmeshwar and the branches below in the form of the three gunas i.e. Rajgun-Brahma, Satgun-Vishnu and Tamgun-Shiv, it is an imperishable, extensive Pipal tree, whose divisions, small-small parts, just as there are verses in Vedas, are said to be twigs and leaves. One, who knows that tree of world in detail, is completely knowledgeable i.e. is Tatvdarshi.

Meaning

In Gita Adhyay 4 Shlok 34, it is stated that Arjun, go to the  Tatvdarshi saints, who know the Tatvgyan of Purna Parmatma and  obtain the path of bhakti of Purna Parmatma with humility; I do not know the path for attaining that Purna Parmatma. In this very Adhyay 15 Shlok 3 also, has mentioned that I will not be able to tell the extent of this world-like tree i.e. creation in this discussion here i.e. in this knowledge of Gita because I do not know about its beginning and end (to the extent it is spread i.e. description of all the brahmands). Regarding a Tatvdarshi saint has explained in this Adhyay 15 Shlok 1 that how would that Tatvdarshi saint be, who will give a complete description of the tree of world that the base is Purna Parmatma, trunk is Akshar Purush i.e ParBrahm, a big branch is Brahm i.e. Kshar Purush and smaller branches are the three gunas (Rajgun-Brahma Ji, Satgun-Vishnu Ji and Tamgun-Shiv Ji) and the leaves are this world i.e. he will give a detailed description of all the brahmands; he is a Tatvdarshi saint.


ऊध्र्वमूलम्, अधःशाखम्, अश्वत्थम्, प्राहुः, अव्ययम्,
छन्दांसि, यस्य, पर्णानि, यः, तम्, वेद, सः, वेदवित्।।1।।

अनुवाद: (ऊध्र्वमूलम्) ऊपर को पूर्ण परमात्मा आदि पुरुष परमेश्वर रूपी जड़ वाला (अधःशाखम्) नीचे को तीनों गुण अर्थात् रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु व तमगुण शिव रूपी शाखा वाला (अव्ययम्) अविनाशी (अश्वत्थम्) विस्तारित पीपल का वृृक्ष है, (यस्य) जिसके (छन्दांसि) जैसे वेद में छन्द है ऐसे संसार रूपी वृृक्ष के भी विभाग छोटे-छोटे हिस्से या टहनियाँ व (पर्णानि) पत्ते (प्राहुः) कहे हैं (तम्) उस संसाररूप वृक्षको (यः) जो (वेद) इसे विस्तार से जानता है (सः) वह (वेदवित्) पूर्ण ज्ञानी अर्थात् तत्वदर्शी है। (1)

भावार्थ:- गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में कहा है कि अर्जुन पूर्ण परमात्मा के तत्वज्ञान को जानने वाले तत्वदर्शी संतों के पास जा कर उनसे विनम्रता से पूर्ण परमात्मा का भक्ति मार्ग प्राप्त कर, मैं उस पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग नहीं जानता। इसी अध्याय 15 श्लोक 3 में भी कहा है कि इस संसार रूपी वृृक्ष के विस्तार को अर्थात् सृृष्टि रचना को मैं यहाँ विचार काल में अर्थात् इस गीता ज्ञान में नहीं बता पाऊँगा क्योंकि मुझे इस के आदि (प्रारम्भ) तथा अन्त (जहाँ तक यह फैला है अर्थात् सर्व ब्रह्मण्डों का विवरण) का ज्ञान नहीं है। तत्वदर्शी सन्त के विषय में इस अध्याय 15 श्लोक 1 में बताया है कि वह तत्वदर्शी संत कैसा होगा जो संसार रूपी वृृक्ष का पूर्ण विवरण बता देगा कि मूल तो पूर्ण परमात्मा है, तना अक्षर पुरुष अर्थात् परब्रह्म है, डार ब्रह्म अर्थात् क्षर पुरुष है तथा शाखा तीनों गुण (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी)है तथा पात रूप संसार अर्थात् सर्व ब्रह्मण्ड़ों का विवरण बताएगा वह तत्वदर्शी संत है।

Sat Bhakti Sandesh