Chapter 15 Verse 18

Yasmaat, ksharam, ateetH, aham, aksharaat, api, ch, uttamH,
AtH, asmi, loke, vede, ch, prthitH, purushottamH ||18||

Translation: (Yasmaat) because (aham) I (ksharam) than the perishable material body, in every respect (ateetH) greater (ch) and (aksharaat) imperishable soul (api) also (uttamH) superior (ch) and (atH) therefore (loke vede) in Lok Ved i.e. based on hearsay knowledge in Vedas (PurushottamH) Supreme God (prthitH) famous (asmi) am. (18)

Translation

Because I am greater than the perishable material body in every respect and am also superior to the imperishable soul, and therefore, in Lok Ved i.e. based on hearsay knowledge in Vedas, am famous as Supreme God.

The narrator of holy Gita, Brahm-Kshar Purush is saying that I am famous as Supreme God only in Lok Ved i.e. on the basis of hearsay knowledge only in my twenty-one brahmands. In reality, the Purna Parmatma is someone else whose description is given in Shlok 17.

God Kabir has stated as an example: -

Peechhe laaga jaaoon tha lok ved ke saath,
Raste mein Satguru mile Deepak deenha haath |

Meaning: - God Kabir has said that until a worshipper finds a Complete Saint, he worships according to Lok Ved i.e. hearsay knowledge. Based on that someone calls Vishnu ji the Complete God; someone calls Kshar Purush i.e. Brahm the Complete God. But through tatvgyan[1], we come to know that Complete God is Kabir Ji.


यस्मात्, क्षरम्, अतीतः, अहम्, अक्षरात्, अपि, च, उत्तमः,
अतः, अस्मि, लोके, वेदे, च, प्रथितः, पुरुषोत्तमः।।18।।

अनुवाद: (यस्मात्) क्योंकि (अहम्) मैं (क्षरम्) नाशवान् स्थूल शरीर से तो सर्वथा (अतीतः) श्रेष्ठ हूँ (च) और (अक्षरात्) अविनाशी जीवात्मासे (अपि) भी (उत्तमः) उत्तम हूँ (च) और (अतः) इसलिये (लोके वेदे)लोक वेद में अर्थात् कहे सुने ज्ञान के आधार से वेदमें (पुरुषोत्तमः) श्रेष्ठ भगवान (प्रथितः) प्रसिद्ध (अस्मि) हूँ पवित्रा गीता बोलने वाला ब्रह्म-क्षर पुरुष कह रहा है कि मैं तो लोक वेद में अर्थात् सुने-सुनाए ज्ञान के आधार पर केवल मेरे इक्कीस ब्रह्मण्ड़ों में ही श्रेष्ठ प्रभु प्रसिद्ध हूँ। वास्तव में पूर्ण परमात्मा तो कोई और ही है। जिसका विवरण श्लोक 17 में पूर्ण रूप से दिया है। (18)

कबीर परमात्मा ने उदाहरणार्थ कहा है:--
पीछे लागा जाऊं था लोक वेद के साथ, रस्ते में सतगुरू मिले दीपक दीन्हा हाथ।

भावार्थ है:-- कबीर प्रभु ने कहा है कि जब तक साधक को पूर्ण सन्त नहीं मिलता तब तक लोक वेद अर्थात् कहे सुने ज्ञान के आधार से साधना करता है उस आधार से कोई विष्णु जी को पूर्ण प्रभु परमात्मा कहता है कि क्षर पुरूष अर्थात् ब्रह्म को पूर्ण ब्रह्म कहता है। परन्तु तत्वज्ञान से पता चलता है कि पूर्ण परमात्मा तो कबीर जी है।


[1] Complete/True Spiritual Knowledge

Sat Bhakti Sandesh