Chapter 5 Verse 1

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 1

(Arjun uvaach)

Sannyaasam, karmnaam, Krishna, punH, yogam, ch, shansasi,
Yat, shreyH, etyoH, ekam, tat, me, broohi, sunishchitam ||1||

(Arjun said)

Translation: (Krishna) Oh Krishna! You (karmnaam) of actions (sannyaasam) renunciation i.e. doing sadhna by abandoning actions, sitting in a posture, closing ears etc (ch) and (punH) then (yogam) of Karmyog i.e doing sadhna while performing actions (shansasi) praise, therefore (etyoH) out of these two (yat) which (ekam) one (me) for me (sunishchitam) definitely (shreyH) is auspicious way (tat) that (broohi) tell. (1)

Translation

Oh Krishna! You praise the renunciation (sanyas) of actions (karm) i.e doing sadhna by abandoning actions, sitting in a posture, closing ears etc, and then praise karmyog i.e. to do sadhna while performing actions. Therefore out of these two tell me that way which is definitely auspicious for me.

Meaning

Arjun is saying that God, on one hand you are saying that it is auspicious to do sadhna while performing actions. Then in Adhyay 4 mantra 25 to 30, you are saying that some believe doing austerity, doing pranayam (the breathing exercise), some by closing nose, ears etc listening to naad (sound) etc, to be the ways to self wellbeing. Therefore, I have become confused by your contradictory statement. Please tell me one way with certainty.

Description of Karm Sanyas

Karm Sanyas is done in two ways;

1. One Sanyas (renunciation) is that in which the devotee, inspired to attain God, stubbornly goes and sits in a jungle and does baseless sadhna devoid of the injunctions of the scriptures;

2. The second, even when staying at home does sadhna by forcefully (hathyog) sitting in one place for hours abandoning the injunctions of the scriptures. Both of these are Karm Sanyasi.

Description of Karmyog

This is also of two types.

1. One living with family, besides performing worldly tasks does scripture-based sadhna, or without getting married, living at home or in a monastery, while performing worldly actions i.e. rendering service, does scripture-based sadhna. Both of these are Karmyogi.

2. The second type of Karmyogis are those who live in family and do sadhna abandoning the methods prescribed in the scriptures, or without getting married, live at home or serve in a monastery. These are also known as Karmyogi.


(अर्जुन उवाच)

सóयासम्, कर्मणाम्, कृष्ण, पुनः, योगम्, च, शंससि,
यत्, श्रेयः, एतयोः, एकम्, तत्, मे, ब्रूहि, सुनिश्चितम्।।1।।

अनुवाद: (कृष्ण) हे कृष्ण! आप (कर्मणाम्) कर्मोंके (सóयासम्) सन्यास अर्थात् कर्म छोड़कर आसन लगाकर कान आदि बन्द करके साधना करने की (च) और (पुनः) फिर (योगम्) कर्मयोगकी अर्थात् कर्म करते करते साधना करने की (शंससि) प्रशंसा करते हैं इसलिए (एतयोः) इन दोनोंमेंसे (यत्) जो (एकम्) एक (मे) मेरे लिए (सुनिश्चितम्) भलीभाँती निश्चित (श्रेयः) कल्याणकारक साधन हो (तत्) उसको (बू्रहि) कहिये। (1)

केवल हिन्दी अनुवाद: हे कृष्ण! आप कर्मोंके सन्यास अर्थात् कर्म छोड़कर आसन लगाकर कान आदि बन्द करके साधना करने की और फिर कर्मयोगकी अर्थात् कर्म करते करते साधना करने की प्रशंसा करते हैं इसलिए इन दोनोंमेंसे जो एक मेरे लिए भलीभाँती निश्चित कल्याणकारक साधन हो उसको कहिये। (1)

भावार्थ:- अर्जुन कह रहा है कि भगवन आप एक ओर तो कह रहे हो कि काम करते करते साधना करना ही श्रेयकर है। फिर अध्याय 4 मंत्र 25 से 30 तक में कह रहे हो कि कोई तप करके कोई प्राणायाम आदि करके कोई नाक कान बन्द करके, नाद (ध्वनि) सुन करके आदि से आत्मकल्याण मार्ग मानता है। इसलिए आप की दो तरफ (दोगली) बात से मुझे संशय उत्पन्न हो गया है कृपया निश्चय करके एक मार्ग मुझे कहिए।

कर्म सन्यास का विवरण

कर्म सन्यास दो प्रकार से होता है, 1. एक तो सन्यास वह होता है जिसमें साधक परमात्मा प्राप्ति के लिए प्रेरित होकर हठ करके जंगल में बैठ जाता है तथा शास्त्रा विधि रहित साधना करता है, दूसरा घर पर रहते हुए भी हठयोग करके घण्टों एक स्थान पर बैठ कर शास्त्रा विधि त्याग कर साधना करता है, ये दोनों ही कर्म सन्यासी हैं।

कर्मयोग का विवरण

यह भी दो प्रकार का होता है। एक तो बाल-बच्चों सहित सांसारिक कार्य करता हुआ शास्त्रा विधि अनुसार भक्ति साधना करता है या विवाह न करा कर घर पर या किसी आश्रम में रहता हुआ संसारिक कर्म अर्थात् सेवा करता हुआ शास्त्रा विधि अनुसार साधना करता है, ये दोनों ही कर्मयोगी हैं। दूसरी प्रकार के कर्मयोगी वे होते हैं जो बाल-बच्चों में रहते हैं तथा साधना शास्त्रा विधि त्याग कर करते हैं या शादी न करवाकर घर में रहता है या किसी आश्रम में सेवा करता है, यह भी कर्म योगी ही कहलाते हैं।