Chapter 17 Verse 3

Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 3

Sattvaanurupa, sarvasya, shraddha, bhavti, bharat,
ShraddhaamayH, ayam, purushH, yaH, yachchhrddhH, saH, ev, saH ||3||

Translation: (Bharat) Oh Bharat! (sarvasya) everyone’s (shraddha) faith (sattvaanurupa) in accordance with their inner-self (bhavti) is (ayam) this (purushH) person (shraddhaamayH) is filled with faith, therefore (yaH) one who (yachchhrddhH) whatever faith one has (saH) he himself (ev) actually (saH) is that only. (3)

Translation

Oh Bharat! Everyone’s faith is in accordance with their inner-self. This person is filled with faith, therefore, whatever faith one has, he himself is actually that only.


सत्त्वानुरूपा, सर्वस्य, श्रद्धा, भवति, भारत्,
श्रद्धामयः, अयम्, पुरुषः, यः, यच्छ्रद्धः, सः, एव, सः।।3।।

अनुवाद: (भारत्) हे भारत!(सर्वस्य) सभी की (श्रद्धा) श्रद्धा (सत्त्वानुरूपा) उनके अन्तःकरणके अनुरूप (भवति) होती है। (अयम्) यह (पुरुषः) व्यक्ति (श्रद्धामयः) श्रद्धामय है इसलिये (यः) जो पुरुष (यच्छ्रद्धः) जैसी श्रद्धावाला है, (सः) वह स्वयं (एव) वास्तव में (सः) वही है। (3)

केवल हिन्दी अनुवाद: हे भारत! सभी की श्रद्धा उनके अन्तःकरणके अनुरूप होती है। यह व्यक्ति श्रद्धामय है इसलिये जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं वास्तव में वही है। (3)